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    हर्षदेव जोशी या हरकदेव - नृपति निर्माता

    हर्ष देव जोशी या हरकदेव जोशी (1747-1815): गाँव झिझाड़, अल्मोड़ा। कुमाऊँ की राजनीति में 'शिवाजी' कहे जाने वाले शिवदेव जोशी के तीसरे पुत्र, चतुर किन्तु कुटिल राजनीतिज्ञ, वीर, साहसी, दूरदर्शी, महत्वाकांक्षी, नृपति निर्माता, कूटनीतिज्ञ हर्ष देव जोशी अपने युग के कुमाऊँ की राजनीति के "अर्ल आफ वारविक" कहे गए हैं।


    हर्ष देव जोशी ने प्राचीन कुमाऊँ की राजगद्दी पर पंजाब से नेपाल तक आठ राजाओं को बारी-बारी से बिठाकर, किसी से सन्तुष्ट न हो, अन्ततः 1815 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को कुमाऊँ की गद्दी पर ला बिठाया था। कर्नल फ्रेजर ने 1815 में नेपाल से हुई लड़ाई के समय जोशी की असाधारण सूझबूझ का उल्लेख करते हुए लिखा था-"हर्ष देव जोशी राजाओं का निर्माता तथा कुमाऊँ का 'अर्ल आफ वारविक है। ब्रिटिश राजनीतिक एजेन्ट डब्लू फ्रेजर ने जोशी का परिचय इस प्रकार दिया था-"उसमें अद्भुत कर्मण्यता और अदम्य उत्साह है। सभी पहाड़ी राज्यों पर, सतलज के उस पार भी उसका बड़ा प्रभाव है। वह हमारा मुख्य उपकरण है, जिससे प्रभावित होकर हजारों कुमाउँनी हमारा साथ देने को उद्यत हैं। उसका नाम सुनते ही गोरखे कांप उठते हैं। कुमाऊँ के भीतर उसका छह हजार लोगों से सम्बन्ध है "(14 जनवरी, 1815 को एजेन्ट को भेजा गया पत्र)।


    हर्ष देव जोशी के प्रति अंग्रेज अधिकारियों की उपरोक्त प्रशस्ति किसी सीमा तक उचित ठहरती है; क्योंकि उसी की कूटनीतिक चालों से ही अंग्रेज गोरखों को यहां से भगा सके और कुमाऊँ में आ धमके थे। यह भी सही है कि वह नृपति निर्माता (King Maker) था। प्राचीन रोम के एक जर्मनी निवासी सेनानायक-रिसीमर ने 3 बार रोम पर राज्य करने के आमंत्रण को ठुकरा दिया; पर उसने स्वयं 5 सम्राटो को राजगद्दी पर बिठाया और उनमें से प्रत्येक को गद्दी से उतारा इस गणित के अनुसार हर्ष देव जोशी विश्व के पहले नृपति निर्माता हैं, न कि सेनानायक रिसीमर। रिसीमर के साथ कौन सी तात्कालिक राजनैतिक परिस्थितियां रही होंगी; इसका उल्लेख तो प्राप्त नहीं है; किन्तु हर्ष देव जोशी ने स्वयं की लिप्सापूर्ति के लिए जो एक से बढ़कर एक गुल खिलाए, वे इतिहास के पृष्ठों में उपलब्ध हैं। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसने अपनों से कई बार गद्दारी की और दुश्मनों से जा मिला। घर का भेदी बनकर घर को आग लगवा दी। अपना (कूर्मान्चल राज्य का) सब कुछ लुटाकर नृपति निर्माता कहलाए तो क्या कहलाए? इस विलक्षण पुरुष से जुड़ी कुछ घटनाओं का यहां संक्षिप्त उल्लेख है:-


    11 दिसम्बर 1764 को काशीपुर में जोशी के पिता और दो भाइयों की हत्या कर दी गई। (कुछ इतिहासकार इस घटना को अल्मोड़ा में होना बताते हैं)। षडयंत्रकारी इन्हें भी मारना चाहते थे, सौभाग्य से उस दिन ये वहां नहीं थे। शिवदेव जोशी की मृत्यु के बाद राजा दीपचन्द ने इन्हें राज्य का बख्शी बनाया। 1777 में एक दिन राजा के चचेरे भाई मोहन सिंह ने राजा दीपचन्द को उसके दो पुत्रों के साथ मरवा दिया और राजगद्दी पर बैठ गया। हर्ष देव जोशी को भी बन्दी बना लिया गया, किन्तु किसी प्रकार व बरेली पहुंच गये। वहां उसने मोहन सिंह को उखाड़ने की योजना बनाई। गढ़वाल के राजा को उसने कुमाऊँ पर आक्रमण करने को उकसाया। राजा जोशी के झांसे में आ गया। उसने एक बड़ी फौज प्रेमपति खण्डूड़ी और धन्नू गद्दी के नेतृत्व में कुमाऊँ पर चढ़ाई करने भेज दी। बग्वाली पोखर में जबरदस्त युद्ध हुआ। राजा मोहन सिंह जान बचाकर लखनऊ की ओर भाग गया। जोशियों ने गढ़वाल के राजा के एक नाबालिग पुत्र प्रद्युम्नशाह को श्रीनगर से लाकर प्रद्युम्न चन्द के नाम से कुमाऊँ की गद्दी पर बैठा दिया। राजा तो नाबालिग, अनुभवहीन और कठपुतली था; शासन की पूरी बागडोर तो हर्ष देव आदि जोशी बन्धुओं के हाथ में थी। नृपति निर्माता हरकदेव ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए मोहन सिंह को हटाया और नाबालिग प्रद्युम्न को गढ़वाल से आयातित कर कुमाऊँ का राजा बना दिया।


    इस बीच मोहन सिंह ने रामपुर के नवाब फैजउल्लाखाँ से अपने खोए राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए सैनिक सहायता की याचना की। जोशी को यह भनक लग गई। जोशी ने नवाब से मोहन सिंह को सैनिक सहायता न देने का अनुरोध किया। इस पर नवाब ने जोशी की बात मान ली। उदास मोहन सिंह प्रयाग राज गया और वहां से 1400 सशस्त्र नागा साधुओं की एक फौज ला कर कुमाऊँ पर चढ़ाई कर गया। चरलेख गाँव में जोशी की सेना से नागाओं की भिडंत हो गई। युद्ध में 700 नागा साधू मारे गए। बाकी भाग गए।


    गढवाल नरेश जयकीर्ति शाह की मृत्यु के पश्चात जोशी ने प्रद्युम्नचन्द को कुमाऊँ से ले जा प्रद्युम्नशाह के नाम से श्रीनगर (गढ़वाल) की गद्दी पर बैठा दिया। नृपति निर्माता का यह तीसरा कूटनीतिक दांव था। इस बीच कुमाऊँ का सिंहासन खाली देखकर मोहन सिंह ने भाड़े के सैनिकों की सहायता से कुमाऊँ की राजगद्दी हथिया ली। जोशी ने इस बीच एक सशक्त सेना खड़ी कर ली। उसे लेकर वह हवालबाग के रास्ते सिटौली के आगे रैलकोट की ओर बढ़ा। यहा पर उसका मुकाबला मोहन सिंह की सेना के साथ हो गया। जोशी ने मोहन सिंह और उसके भाई लालसिंह को बन्दी बना लिया। उसका पत्र महेन्द्र सिंह भागकर रामपुर चला गया। कुछ महीने जोशी ने स्वयं बिना राजा के कुमाऊँ पर शासन किया। नृपति निर्माता की यह अगली जीत थी।


    1788 में हर्ष देव ने शिव सिंह नाम के एक रौतेले को चन्दवंश का वंशज बताकर कुमाऊँ की राजगद्दी पर बैठा दिया और स्वयं शासन चलाने लगा। नृपति निर्माता हरकदेव जोशी के लिए रंक को राजा बना देना और राजा को रंक-चुटकी का काम था। इस बीच मोहन सिंह के भाई लाल सिंह ने नवाब रामपुर की सहायता से कुमाऊँ की गद्दी हथिया ली। भीमताल के निकट धर्मशिला नामक गाँव के पास लालसिंह और जोशी की सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ। जोशी पराजित होकर शिवचन्द्र के साथ गढ़वाल भाग गया। अबकी बार कुमाऊँ के राजसिंहासन पर मोहन सिंह का पुत्र महेन्द्र सिंह बैठा। लाल सिंह ने राज्य के सर्वोच्च पद दीवान और बख्शी स्वयं सम्भाले। लालसिंह ने जोशियों का खूब उत्पीड़न किया। हर्ष देव श्रीनगर से बरेली पहुंचा और वहां बरेली के सूबेदार मिर्जा मेहन्दी अलीबेग से कुमाऊँ राज्य हस्तगत करने के लिए सैनिक सहायता मांगी, किन्तु निराशा हाथ लगी।


    जनवरी, 1790 से पूर्व गोरखालियों ने करनाली और काली नदी की मध्यवती उपत्यका के छोटे-बड़े राज्यों डोटी, दैलेख, बैतडी आदि पर अधिकार कर लिया था। काली नदी पार कर अब राज्य को भी अपने अधिकार क्षेत्र में करना चाह रहे थे। जोशी ने गोरखाली सेना की सहायता से कुमाऊँ की सत्ता हथियाने की योजना बनाई। उसने गोरखाधीश के नायक बहादुरशाह को कुमाऊँ पर आक्रमण करने का न्योता दिया। कुमाऊँ की राजनीतिक अस्थिरता से वह सुपरिचित था। 30 जनवरी, 1790 को काजी जगजीत पाण्डे, सरदार अमरसिंह थापा, कप्तान गोलैया, कप्तान रणवीर खत्री, सुब्बा जोगनारायण मल्ल, सुब्बा फौंदसिंह और शूरवीर सिंह खत्री के नेतृत्व में गोरखाली सेना कुमाऊँ की ओर बढ़ी। 1 फरवरी, 1790 को राजधानी अल्मोड़ा पर गोरखालियों का कब्जा हो गया। उस समय जोशी जगजीत पाण्डे के साथ था। इस नृपति निर्माता की कूटनीति के कारण 800 वर्ष पुराने चन्द राजवंश का अवसान हो गया और कुमाऊँ आगामी 25 वर्षों के लिए विदेशी दासता के हवाले हो गया। गोरखालियों ने झिझाड़, दन्या, दिगौली, कलीन, सर्प, औलियागांव और गल्ली के जोशियों को कामदार नियुक्त किया। द्वारा के चौधरी तथा गंगोलीहाट, उपराड़ा, स्यूनराकोट और खूट गांवों के पन्तों को भी अनुग्रह प्राप्त हुआ। जोशी को उसकी इच्छा के विपरित काली नदी के पश्चिम की ओर के विभिन्न प्रदेश न सौंपे जाने से वह बौखला गया। उसकी नीयत पर शक हो जाने और उसके पिछले दगाबाजी के इतिहास से चिढ़कर अमरसिंह थापा ने उसे और उसके पुत्र जगत नारायण जोशी को बन्दी बना लिया। जोशी गंगोली में पहरेदारों को चकमा देकर भाग निकला और गढ़वाल जा पहुंचा। कहते हैं, गोरखालियों के भय से वह साधू बन गया था। कुछ दिन कनखल में भारामल खत्री के घर पर रहा। उसका पुत्र जगत नारायण काठमाण्डू में गोरखों की कैद में ही रहा। बाद में अंग्रेजों ने उसे छुड़ाया। कनखल में हर्ष देव जोशी गढ़वाल से निर्वासित राजकुमार सुदर्शनशाह की शरण में अपमान का घूंट पीकर जी रहा था। यह स्थिति उसके लिए असह्य थी। उसने एक नई चाल चली। नेपाल-कम्पनी युद्ध से पूर्व वह ब्रिटिश पौलेटिकल एजेन्ट से मिला और कुमाऊँ पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। अंग्रेज तो मौके की तलाश में थे ही। 27 अप्रैल 1815 को कर्नल गार्डनर और कैप्टेन हैदरयंग हियरसे की अगुवाई में ब्रिटिश फौजों ने राजधानी अल्मोडा पर कब्जा कर लिया। गोरखा सेना घारचूला के रास्ते काली नदी पार कर नेपाल चली गई। होनी को तो कोई टाल नहीं सकता है, किन्तु इतिहास साक्षी है कि हर्ष देव जोशी ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कुटिल चालें चलकर कुमाऊँ को एक बार फिर 132 वर्षों के लिए औपनिवेशिक दासता की आग में झोंक दिया। 15 वर्षों की अवधि में उसने 7 युद्ध लड़े। 8 राजाओं को गद्दी से उतारा इतनों को ही राजा बनाया। अन्त में उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ा। उसके सारे सपने ध्वस्त हो गए। कूर्मान्चल की धरती पर जन्मा यह अनूठा कूटनीतिज्ञ, घोर महत्वाकांक्षी और स्वार्थी, घर का भेदी, कुटिल, वीर, साहसी पुरुष अनन्त तक कुमाऊँ के इतिहास के पृष्ठों में अपनी शकुनि चालों के लिए चर्चित रहेगा।

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