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    गढ़वाल चित्रकला शैली का इतिहास

    भारत के सांस्कृतिक क्षितिज के इतिहास में मुगलवंश का विशिष्ट योगदान पहाड़ी चित्रकला शैली के अन्तर्गत गढ़वाल चित्रकला पर विशेष रूप से रहा है। मध्य काल में गढ़वाल मुगल सांस्कृतिक सम्बन्धों के साथ ही एक गौरवशाली अध्याय की शुरुआत भी होती है जो दुर्लभ एवं अनूठा प्रसंग है। दुर्भाग्य से इतिहासकार इस पहलू को उजागर नहीं कर सके। गढ़वाल की चित्रकला अन्य पहाड़ी कलाओं की भांति मुगल चित्रकला से प्रभावित राजपूत चित्रकला का पहाड़ी रूपान्तर है। गढ़वाल चित्रकला के आधार स्तम्भ मुगल दरबार के दो चित्रकार थे, जो दिल्ली से गढ़वाल आ बसे थे। ये दोनों पिता-पुत्र श्यामदास और हरदास सन 1658 ई. में शाहजादे सुलेमान शिकोह के साथ श्रीनगर (गढ़वाल) आये थे।


    जिस समय दिल्ली के तख्त के लिये मुगल सम्राट शाहजहां के पुत्र औरंगजेब और दारा शिकोह आपस में भिड़ रहे थे, दारा लाहौर से दिल्ली की ओर बढ़ रहा था, उसका लड़का सुलेमान शिकोह उस समय इलाहाबाद में था। सुलेमान ने चाहा कि वह अपने पिता की सेना के साथ मिल कर दिल्ली की ओर बढ़े। इलाहाबाद से वह पहाड़ों की तलहटी में नगीना पहुंचा वहां से उसने कूमांचल (कुमायूं) नरेश के पास पत्र भेज कर राज्य में प्रश्रय देने का अनुरोध किया किन्तु उसके इन्कार करने पर सुलेमान ने गढ़वाल नरेश पृथ्वीपति शाह (1640-1660 ई.) को एक पत्र लिखा, और उसकी राजधानी श्रीनगर में शरण मांगी, जिस पर सहर्ष अनुमति मिलने पर सुलेमान शिकोह अपने सेवक एवं दरबारियों सहित मई 1658 ई. में श्रीनगर पहुंचा। उसके इन दरबारियों में दो चित्रकार श्यामदास और हरदास भी थे जिन्होंने गढ़वाल के राज दरबार में चित्रकला को सर्वप्रथम जन्म दिया।


    गढ़वाल चित्रकला का सिद्धहस्त कला पारखी मोलाराम ने लिखा है कि जब उनको यह पता चला कि श्यामदास और हरदास तंवर जाति के थे, और शाहजादे सुलेमान के दीवान थे, तो उनको गढ़वाल के राजा ने भी अपने दरबार में यथोचित सम्मान प्रदान किया। इस प्रकार मौलाराम के पूर्वज गढ़वाल में चित्रकला के जन्मदाता, श्यामदास और हरदास श्रीनगर गढ़वाल में ही रह गये। उनको गढ़वाल नरेश ने चित्रकार के पद पर नियुक्त कर दिया था। साथ ही उनके लिये दरबार में 'तस्वीरदार' का एक नया पद सृजित कर दिया था। स्वयं राजा इनसे फारसी का अध्ययन भी करने लगा था।


    इस प्रकार गढ़वाल रियासत के सानिध्य में हरदास का पुत्र हीरालाल और उनका लड़का मंगतराम मुगल शैली के चित्र बनाने लगे। मंगतराम का पुत्र मौलाराम गढ़वाल के चित्रकारों में सर्वोत्कृष्ट कलाकार हुआ। इस तरह गढ़वाल चित्रकला शैली का जन्म स्थल श्रीनगर गढ़वाल था। वही श्रीनगर था जो मौनाताल की भयंकर बाढ़ तबाही में 1894 में बह कर नष्ट हो गया था। इस विनाश लीला को मोलाराम के पुत्र ज्वालाराम ने अपनी कला-कृति में बनाया था।


    गढ़वाल की चित्रकला भी गुलेर, कांगड़ा, मंडी और चम्बा आदि पहाड़ी कलाओं की तरह मुगल कला से प्रभावित थी। सुलेमान शिकोह के श्रीनगर आने का वृतांत लिखते हुये मोलाराम ने अपने पूर्वजों तथा अपने चित्रों और चित्रकला के विषय में लिखा है कि गढ़वाल में सन् 1658 ई. में मोलाराम के पूर्वजों के द्वारा चित्रकला की नींव रखी गई थी। वह प्रायः 300 वर्ष तक जीवित रही। उसके अन्तिम ख्यातिप्राप्त चित्रकार तुलसीराम की मृत्यु 1950 ई. में हुई। गढ़वाल चित्रकला का स्वर्णिम काल मोलाराम का युग था।


    गढ़वाल शैली के चित्रों के अध्ययन से पता चलता है कि कांगड़ा के कलाकारों के सम्पर्क में आने से पूर्व मौलाराम मुगल शैली में चित्रलेखन करता था। इस श्रृंखला का पहला उपलब्ध चित्र "रानियों का आश्वासन" है जिस पर काल सम्वत 1826 फाल्गुन 15 (सन् 1769 मार्च) दिया है। इसमें उसने तत्कालीन दरबारियों और कर्मचारियों की जी हुजूरी और चापलसी का एक आकर्षक चित्र लेख के साथ प्रस्तुत किया है।


    एक अन्य शब्द चित्र जो मुकन्दी लाल के संग्रह से प्राप्त हआ है, यह रेखाचित्र "हिंडोला" है। चित्र में ग्यारह स्त्रियां हैं जो चार समूह में खड़ी हैं। एक मुगल दम्पति (स्त्री-पुरुष) हिंडोले में बैठे हैं। चित्र में बैठा पुरुष ऐसा प्रतीत होता है जैसा कि शहजादा सलीम (जहांगीर) है। वह बाग में किसी


    अपनी लाडली सखी के साथ झूल रहा है। मुकन्दीलाल को गढ़वाल चित्रकला के चित्रा का खोज के दौरान एक रंगीन चित्र मुगल शैली का, युवा अकबर एक ग्रामीण कुएं पर जलपान करते हये, मिला। इसी प्रकार 1936 में मुगल शैली का मस्तानी नामक चित्र बालकराम के संग्रह से मिला है जो मुगल शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। चित्र में स्नान कर बैठी हई बेगम गाना सुनते हुये मदिरापान कर रही है।


    गढ़वाल चित्रकला के विषय और विशेषताएं महज सूचनात्मक नहीं रहे, बरन इनसे तत्कालीन सामाजिक आर्थिक-धार्मिक एवं राजनीतिक स्थिति की प्रमाणिक जानकारियां भी इतिहास लेखन की दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित हुई हैं।


    गढ़वाल शैली के चित्र यद्यपि कांगड़ा के समान लघुचित्र है, किन्तु गढ़वाल शैली के चित्रों में आकृतियों को कांगड़ा शैली की अपेक्षा सरल और सपाट बनाया गया है। इसमें रेखायें अधिक बलवती और प्रवाहपूर्ण है। गढ़वाल शैली की आकृतियों में अधिकांश वक्रीय आकृतियों को अपनाया गया है। स्त्रियों की आकर्षक भावपूर्ण मुद्रायें रंगीन चित्रों में भी चित्रित की गई हैं। इसमें बड़े-बड़े कमल नेत्र, लम्बी सीधी नाक, गोल-चिबुक भावाभिव्यंजक हस्त मुद्रायें तथा अंग भंगिमायें गढ़वाल शैली की स्त्री आकृतियों की विशिष्टता है। पुरुषों के पहनावे में विशेषतया लम्बा जामा चुस्त, तथा पायजामा, पगड़ी, पटका आदि बनाये गये हैं।


    गढ़वाल शैली के अधिकांश चित्रों में प्रकृति को विशेष महत्व दिया गया है। पर्वतों का पृष्ठभूमि में चित्रांकन किया गया है। दृश्य चित्रण की यह पद्धति बहुत न कुछ मुगल शैली को व्यक्त करती है। चित्रकारों का न चित्रण विषय भागवत पुराण, रामायण, बिहारी सतसई, मतिराम तथा रागमाला प्रमुख है। इन विषयों के अतिरिक्त चित्रकारों ने अनेक देवी-देवताओं के चित्रों का निर्माण किया है। यहां रुकमणी, मंगल, नल, दमयन्ती, गीत-गोविन्द नायिका भेद, दशावतार अष्ट दुर्गा, कामसूत्र, शिव पुराण आदि पर भी चित्र बनाये गये हैं।


    पहाड़ी कला के उच्च कोटि के मान्य पारखियों में गढ़वाल चित्रकला को मान्यता सबसे पहले डॉ. आनन्द कुमार स्वामी ने दी, जिन्हें मुकन्दीलाल ने अपने संग्रह से 6 चित्र प्रदान किये थे। इनके अध्ययन के आधार पर उन्होंने सन् 1916 ई. में अपनी पुस्तक "राजपूत पेन्टिंग" में लिखा कि गढ़वाल चित्रकला कांगड़ा और उसके निकटवर्ती पहाड़ी रियासत पटियाला आदि से मिलती जुलती है। गढ़वाल चित्रकला की प्रसिद्धि का कारण यह है कि मौलाराम और उसके पूर्वजों के बनाये हए कई रंगीन चित्र और रेखाचित्र गढ़वाल में पाये गये हैं। इसी प्रकार अंग्रेज कलापारखी और समीक्षक मि. आर्चर ने अपनी पुस्तक "गढ़वाल पेन्टिंग" में 10 रंगीन चित्र गढ़वाल चित्रकला के देते हुये लिखा है कि 'गढ़वाल में एक वैसी ही सुन्दर रसीली, लावण्यमय, रोमांचक और चित्ताकर्षक शैली का विकास हुआ, जैसी पंजाब की एक अन्य पहाड़ी रियासत कांगड़ा में विकसित हुई। भारतीय चित्रकला को गढ़वाल के चित्रकारों से एक महानतम देन मिली है।


    मौलाराम के बाद इस चित्रकला के पतन के चिन्ह तथा उस पर पाश्चात्य कला का प्रभाव शनैः शनैः चित्रों पर दिखाई देने लगा था। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में भारतीय चित्रकला पर पाश्चात्य कला का प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हो गया था। गढ़वाल शैली भी इससे अछूती नहीं रही। शिवराम की बनाई हई सलेमान शिकोह की छवि, ज्वालाराम के महादेव पार्वती और बद्रीनाथ-केदारनाथ के यात्रा पथ के नगरों के चित्र तथा उसके बनाये हुये पक्षियों तथा फूलों के चित्रों में और तुलसीराम के प्राकृतिक दृश्यों के चित्रण में पाश्चात्य प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।


    गढ़वाल चित्रकला के लुप्त हो जाने के मुख्य कारणों में चित्रकारों के गुणग्राहकों का नितान्त अभाव का होना था। इसकी ओर उत्तराखण्ड पर गोरखा आधिपत्य (1803 से 1815) एवं तत्पश्चात अंग्रेजी शासन के नियंत्रण में आने के उपरान्त टिहरी और ब्रिटिश गढ़वाल के विभाजन से श्रीनगर कला केन्द्र नष्ट हो गया था, क्योंकि गोरखा और अंग्रेज प्रशासकों ने कलाकारों को प्रश्रय देने के स्थान पर उनके खानदान की जागीरें छीन कर उनका गुजारा बन्द कर दिया था। स्वयं मौलाराम का पुत्र ज्वालाराम कुमाऊं कमिश्नर सर हेनरी रामजे का अहलमद नियुक्त हो गया था, यद्यपि वह निजी स्तर पर चित्रकारी भी करता रहा। उसके अन्य भाई अजबराम आदि भी घर छोड़ कर बिखर गये थे। मौलाराम के वंशज जो श्रीनगर में रह गये थे, वे सोना, चांदी का काम करने लगे। इस प्रकार धीरे-धीरे इस कला का लोप हो गया।


    इस चित्रकला के लोप होने के कारणों में यह भी उल्लेखनीय है कि कलापक्ष की गूढ़ बातें, प्राविधिक मर्म एवं रंग तैयार करने की विधि को मौलाराम ने अपने लड़कों अथवा शिष्यों को नहीं बताया। एक और अन्य कारण यह भी था कि ज्वालाराम के बाद जो चित्रकला से जुड़े रहे उनमें से कुछ विक्षिप्त होने लगे थे। उनके पागलपन का सम्बन्ध चित्रकला से माना गया, इसी कारण उनके वंशजों ने वंशानुगत मुगल-गढ़वाल सांस्कृतिक सम्बन्धों से जन्मी गढ़वाल चित्रकला शैली को छोड़ कर चित्रकला जगत से ही नाता तोड़ दिया। कहा जा सकता है कि गढ़वाली चित्रकला शैली की खोज से, भारतीय चित्रकला में इस शैली के स्वतंत्र अस्तित्व से कला पारखी अवगत हो सके। इस प्रयास में वैरिस्टर मुकन्दीलाल के योगदान को भुलाना कठिन है, जिनके अथक प्रयासों से इस शैली से देश के कला मर्मज्ञ समीक्षक एवं पारखी अवगत हो सके थे। निसन्देह मुकन्दीलाल द्वारा संकलित गढ़वाल चित्रकला का संग्रह हमारी कला-संस्कृति के साथ ललित कलाओं के, इतिहास की जानकारी देने वाला प्रमाणिक ग्रन्थ भी बन गया है।

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