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    देवीधुरा मंदिर

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     देवीधुरा

     स्थापना: अज्ञात  
     स्थान:  चम्पावत 
     विकाशखंड: पाटी, अल्मोड़ा 
     स्थापित:  पांडवों द्वार 
     समुद्र तल ऊंचाई:  2500 मीटर 
     प्राथमिक देवता:  माँ बाराही 


    चम्पावत जनपद मुख्यालय से 60 किमी0 की दूरी पर स्थित देवीधुरा आबादी और बनावट के लिहाज से किसी छोटे पहाड़ी कस्बे की तरह है। एतिहासिक दृष्टि से यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण रहा है। पुरातात्विक महत्व के कई स्मारक आज भी यहाँ अतीत की गौरव गाथा सुनाते जान पड़ते हैं। अल्मोड़ा-लोहाघाट मार्ग पर ढोलीगाँव-देवीधुरा पर्वतमाला के उत्तर-पश्चिम छोर पर बसा देवीधुरा समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। प्राकृतिक दृश्यावलियों की दृष्टि से देवीधुरा अत्यन्त रमणीक स्थान है। यहाँ से पूर्व की ओर जहाँ तक दृष्टि जाती है, एक के पीछे एक ऊँची-नीची वनाच्छादित पर्वत श्रृंखलायें ही दिखाई देती हैं। इस स्थान पर बिखरे हुए अवशेषों को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्वकाल में यहाँ प्राचीन कत्यूरी शैली के मंदिरों का समूह रहा होगा। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह स्थान महाभारत में पांडवों के अज्ञातवास से लेकर अनेक पौराणिक, धार्मिक व ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा रहा है।


    देवीधुरा का शाब्दिक अर्थ है देवी का धुरा अर्थात देवी का पहाड़। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार शक्ति का धाम हमेशा ऊँची चोटियों पर ही रहा है। यहाँ पर अज्ञातकाल से ही ‘देवी’ की पूजा-अर्चना की जाती रही है। आजकल की ‘बाराही’ लेकिन लोकगीतों की ‘आषड़ी’ देवी की पूजा, एक दूसरे पर टिकी हुई तीन विशालकाय शिलाओं के बीच बनी गुफा के भीतर एक शिला के रूप में की जाती है जिसे ‘गबौरी’ कहा जाता है और जिसके ऊपर मन्दिर का आच्छादन-सा बना हुआ है। ‘गबौरी’ में दो दीपक दिन-रात जलते रहते हैं। इनको निरन्त जलाये रखने का कार्य पुजारी का होता है जो निकटवर्ती गाँव टकना में निवास करने वाली ‘गुरौ’ जाति से होते हैं और बारी-बारी से देवी की पूजा द्वार से प्रवेश कर पश्चिमी द्वार से बाहर निकलने की परंपरा है। ‘गबौरी’ के प्रवेश द्वार के पास भैरव का छोटा-सा मंदिर है। यहाँ ‘गबौरी’ के प्रवेश द्वार के अतिरिक्त एक पृथक द्वार भी है जो उत्तर-पश्चिम की ओर खुलता है। ‘अठवार’ (आठ पशुओं की बलि) के साथ बलि के लिए लाए गए महिष को पश्चिम की ओर से घुमाकर इसी द्वार से प्रवेश कराया जाता है। यह द्वार अपेक्षाकृत कुछ बड़ा है जबकि दोनों ओर के ‘गबौरी’ द्वार अत्यंत संकीर्ण हैं और इनसे होकर एक बार में केवल एक व्यक्ति ही प्रवेश करता है।


    ‘गबौरी’ का निर्माण करने वाली तीनों भीमकाय शिलाएं बलुवा पत्थर की बनी हुई है। धूप, हवा, वर्षा तथा हिम के प्रभाव से इनकी बाहरी सतह चिकनी हो गई है। पहाड़ के शिखर में इतनी विशाल शिलाओं का मिलना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इन शिलाओं पर छोटे-बड़े ओखल के समान रचनाएं उकेरी गई हैं जिनको इतिहासकारों ने पाषाणयुगीन बताया है। इससे प्रतीत होता है कि उस काल में भी यहाँ मानव निवास करता था। संभव है कि उसी मानव ने ‘गबौरी’ के भीतर अपने आराध्य की पूज-अर्चना प्रारम्भ की हो, जो आज तक चली आ रही है।


    देवीधुरा का माँ बाराही धाम भारत के गिने-चुने वैष्णवी मंदिरों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार जब हिराणक्ष्य पृथवी को पाताल लोक ले जा रहा था तो पृथ्वी की करुण पुकार सुन भगवान विष्णु ने बराह रूप धारण कर पृथ्वी को अपने बाम में लेकर उसे डूबने से बचाया था। तभी से पृथ्वी स्वरूपा वैष्णवी बाराही कहलाई। यही शक्तिस्वरूपा माँ बाराही अनादिकाल से गुफा में रहकर भक्तों की मनोकामन पूरी करती है।


    प्रत्यक्ष रूप में तीन विशाल भीमकाय शिलाओं के बीच में माँ बाराही की शक्ति पिंड प्राकृत लिंग के रूप में विद्यमान है, जिसकी महिमा शब्दों से परे है। मान्यता है कि एक बार बाराही धाम में माँ के शक्ति पिंड के दर्शन करने वाला व्यक्ति इस लोक में किए गए सभी पापों से मुक्त हो जाता है। देवीधुरा में माँ बाराही साक्षात प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करती है। चौंसठ योगिनियों में से एक योगिनी ‘बाराही’ नाम की भी है। विष्णु के अवतार बराह की शक्ति को भी बारही कहा जाता है। बराही के बारह नामों के सम्बन्ध में एक श्लोक हैं -


    पंचमी दण्डनाथ च संकेता समयेश्वरी तथा समय संकेता बाराही क्षेत्रिणी शिवा।
    वार्ताली च महासेना स्वज्ञा चक्रेश्वरी तथा आरिहनी च ति सम्प्रोक्तं नाम द्वादशक मुने।।


    माँ बाराही के पाषाण मंदिर के पिछले भाग में विशाल शिलाखंड है जिसे भीम शिला के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि अज्ञातवास के समय पाण्डव यहाँ आये थे। एक शिला के ऊपर दूसरी शिला तथा शिलाखंड में पंजों के निशान है जिन्हें भीम से जोड़कर देखा जाता है।


    श्रावण मास में देवीधुरा यहाँ होने वाले अनूठे पाषाण युद्ध के लिए प्रसिद्ध है। श्रावण शुक्ल एकादशी से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तक लगने वाले मेंले का प्रमुख आकर्षण रक्षाबंधन (पूर्णमासी) के दिन होने वाली बग्वाल (पाषाण युद्ध) है जिसे देखने देश-विदेश से हजारों की संख्या में दर्शक यहाँ आते हैं। बग्वाल मंदिर के ठीक सामने ‘खोलीखांण’ के मैदान में वालिक, लमगड़िया, चम्याल और गहड़वाल खामों के बीच खेली जाती है जिसमें चारों खामों के लोग दो गुटों में बंटकर एक दूसरे के ऊपर पत्थर से वार करते हैं। बग्वाल के प्रारम्भ को लेकर अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में मुचकंद राजा की सेना ने भी भाग लिया था और असुरी को माँ बराही की कृपा से पराजित किया था तब देवसेना ने प्रसन्न होकर प्रतीक स्वरूप बग्वाल खेली थी।


    देवीधुरा में नविनिर्मित भव्य मंदिर के ऊपरी तल में तांबे की पेटिका में रखी गई माँ बाराही की मुर्ति का रंग-रूप आज भी रहस्य बना हुआ है। इस पेटिका में माँ बाराही, महाकाली व सरस्वती की मूर्तियाँ रखी गई हैं। कहा जाता है कि जब चम्पावत में ‘चंद’ वंश का राज्य स्थापित हो गया तो उस वंश के किसी राजा ने स्वर्ण की देवी मूर्ति बनवाकर यहाँ स्थापित कर दी और गहड़वाल जाति को इसकी सुरक्षा का भार सौंप दिया। यह ज्ञात नहीं है कि कब वह स्वर्ण की मूर्ति अन्य दो मूर्तियों के साथ ताम्र-पेटिका में रखी गई? इस पेटिका में ताला लगा रहता है जिसे प्रशासन के प्रतिनिधि और चारों ‘खामों’ के प्रमुखों के सामने प्रतिवर्ष खोला और बन्द किया जाता है।


    जनश्रुति के अनुसार माँ बाराही की मूर्ति में बज्र के समान तीखी चमक होने से इसे आत जक कोई खुली आँखों से नहीं देख सका है। जब भी कौतुहलवश किसी ने इसे देखने का प्रयास किया भी तो असे सदा के लिए अपनी नेत्र ज्योति गंवानी पड़ी। रक्षाबंधन यानि बग्वाल के दिन चारों खामों के लोग पेटिका को मंदिर के पास ही बने नंद घर में लाकर विराजमान करते हैं। महिलाएं रात्रि में उसके चारों ओर एकत्र होकर अखंड दीप के समक्ष हाथों में अक्षत लिए एकाग्र मन से पूजा-अर्चना करती हैं। इसके चारों ओर अन्य भक्त धुनी जलाकर रातभर माँ बाराही का जाप कर जागकरण करते हैं।
    दूसरे दिन तीनों मूर्तियों को दूध से स्नान कराया जाता है। बाद में चारों खामों के लोग माँ बाराही के जयकारे के साथ जुलूस के रूप में मंदिर के लंबे-चौड़े प्रांगण में युद्ध के लिए मोर्चें पर आ डटते हैं। पुजारी के शंखनाद के साथ ही बग्वाल शुरू हो जाता है। बग्वाल खेलने वाले पत्थरों से बचने के लिए अपने साथ बांस के बने फर्रें रखते हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति शुद्ध मन व पूर्णं श्रद्धा से बग्वाल खेलता है उसे चोट नहीं लगती। युद्ध के दौरान घायल लड़ाके पत्थरों की चोट को माता का प्रसाद मानते हैं। इस चोट पर किसी तरह की मरहम पट्टी नहीं की जाती। जिस समय यह रोमांचकारी युद्ध होता है, पुजारी मंदिर में माँ बाराही की पूजा-अर्चना करता है।


    यकायक वह भाववश मैदान में पहुँच शंखानाद करता है और पुजारी के शंखनाद के साथ ही पत्थरों के इस युद्ध को रोक दिया जाता है। इसके बाद चारों खामों के योद्धा आपस में गले मिलते हैं। परंपरा के अनुसार सामान्यतः बग्वाल 15 मिनट से लेकर आधे घंटे तक खेली जाती है। मंदिर के पुजारी को जब यह आभास होता है कि युद्ध में एक व्यक्ति के बराबर रक्त बह चुका है तब वह मैदान में पहुँचकर युद्ध विराम की घोषणा करता है। इस प्रकार बग्वाल प्रतिवर्ष नरबलि के विकल्प रूप में खेली जाती है।


    रक्षांबधन के दिन आयोजित होने वाले इस पाषाण युद्ध ये जुड़ी लोक मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में माँ बाराही को प्रसन्न करने के लिए यहाँ नरबलि देने की प्रथा थी। तब प्रतिवर्ष इन चार खामों के परिवारों में से किसी एक सदस्य की बलि दी जाती थी। इस प्रकार जब चम्याल खाम की एक वृद्धा की बारी आई तो वंश नाश के डर से उसने अपने पोते की बलि देने से इंकार कर दिया। कहीं देवी कुपित न हो जाए, यह सोचकर गाँव वालों ने निर्णय लिया कि बग्वाल यानि पत्थरों का युद्ध कर एक मनुष्य के शरीर के बराबर रक्त बहाया जाय। तभी से नरबलि के प्रतीकात्मक विरोध स्वरूप परंपरा को जीवित रखते हुए हर साल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को चारों खामों के लोग यहाँ ढोल-नगाड़ों के साथ पहुँचकर पत्थर युद्ध खेलते हैं।


    पत्थरों के इस रोमांचकारी खेल को देखने के लिए हजारों की संख्या में पर्यटक देवीधुरा पहुँचते हैं। इनमें विदेशी सौलानियों की भी बड़ी तादाद होती है। यह मेंला अब पर्यटन का स्वरूप धारण कर चुका है जिसमें उत्तराखण्ड की विविधतापूर्ण संस्कृति के दर्शन किए जा सकते हैं। यह सम्पूर्ण क्षेत्र धार्मिक रूप से जितना प्रसिद्ध है, प्राकृतिक रूप से उतना ही सुंदर है। यही कारण है कि लोक परंपराओं से जुड़े इस अनूठे मेले को देखने श्रद्धालु तो पहुँचते ही हैं, साथ ही प्रकृति प्रेमी भी यहाँ आना नहीं भूलते।

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