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    मानवेन्द्र शाह - अंतिम टिहरी नरेश

    manabendra shah last emperor of tehri

    मानवेन्द्र शाह

     जन्म:  मई 26, 1921
     जन्म स्थान:  टिहरी, गढ़वाल
     पिता:  श्री
     माता:  श्रीमती कमलेन्दुमति शाह
     पत्नी:  श्रीमती इंदिरा शांडिल
     बच्चे: 3 पुत्रियाँ, 1 पुत्र
     व्यवसाय:  राजनीतिज्ञ
     राजनीतिक दल:  बी.जे.पी

    मानवेन्द्र शाह- राजा (1921): राजभवन, टिहरी। टिहरी रियासत के अंतिम नरेश। ब्रिटिश सरकार से 'महाराजा' के विरूद से सम्मानित। स्वाधीनता के बाद राजदूत और सांसद रहे।


    1936 में इन्होंने मेयो कालेज, अजमेर से डिप्लोमा प्राप्त किया। 4 फरवरी, 1939 को राजस्थान में बांसवाड़ा रियासत के महारावल पृथ्वीसिंह की पुत्री के साथ प्रणयसूत्र में बंधे। अगले वर्ष इनकी एक कन्या पैदा हुई। लाहौर में सैन्य शिक्षा और आई.सी.एस. का भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। 25 अक्टूबर 1946 को राजकुमार मानवेन्द्र शाह का राज्यारोहण हुआ। पंजाब हिल स्टेट्स के पौलिटीकल एजेन्ट ने ब्रिटिश राजमुकुट के प्रतिनिधि वायसराय की ओर से महाराजा मानवेन्द्र शाह के राज्यारोहण को वैध घोषित किया। तब किसी ने सोचा न होगा कि नया महाराजा पूरे 3 वर्ष भी शासन न कर सकेगा और यही इस राजवंश का अन्तिम नरेश होगा।


    महाराजा मानवेन्द्र शाह को मिला राजमुकूट कांटों से भरा ताज था। एक अस्थिर राज्य के खेवनहार बने राजा साहब। तब तक टिहरी राज्य प्रजामण्डल की जडें राज्य में गहरी जम चुकी थी। राज्य के अधिकांश हिस्सों में सामंतशाही शासन के विरुद्ध खुलकर आन्दोलन होने लग था राष्ट्रीय विचारधाराओं और राजशाही के मध्य टकराव का ज्वालामुखी फटने की स्थिति में था। राज्यारोहण के ठीक एक महीने बाद 27 नवम्बर, 1946 को कृषक आन्दोलन के बन्दियों सर्वश्री परिपुर्नानंद पैन्यूली, अवतार सिंह और मेहताब सिंह को डेढ़ से पांच वर्ष तक कैद और भारी जुर्माने की सजा सुना दी गई। दौलतराम कुकसाल और 32 अन्य बंदियों को भी कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। बड्यारगढ़, सकलाना, कीर्तिनगर आदि और जगहों पर 'आजाद पंचायतें' गठित हो गई थीं। पूरा राज्य विद्रोह की चपेट में आ गया। प्रजा फौज और पुलिस का सामना करने पर उतारू हो गई। कीर्तिनगर में राज्याधिकारियों की गोली से नागेन्द्र सकलानी और मोलू सिंह की मृत्यु हो जाने से आन्दोलनकारी मरने-मारने को तैयार हो गए। 16 जनवरी, 1948 को राजधानी टिहरी पर आन्दोलनकारियों का कब्जा हो गया। तीन दिन तक राज्य की व्यवस्था डांगचौरा के कृषक नेता दौलतराम कुकसाल के प्रधानमंत्रित्व में चली। बाद में भारत सरकार के हस्तक्षेप से महाराजा की छत्रछाया में 'अंतरिम सरकार' गठित की गयी। सर्वश्री आनन्द शरण रतूड़ी, खुशहाल सिंह रांगड़, डा. कुशलानन्द गैरोला और डा. कृष्ण सिंह आदि अन्तरिम सरकार के मंत्रिमण्डल के सदस्य थे। पहली अगस्त, 1949 को राज्य का भारत संध में विलीनीकरण कर दिया गया। और इस प्रकार सम्पूर्ण भारत में राजवंशों के शासन का सिलसिला समाप्त हुआ। रियासत टिहरी में मुआफीदारी का अन्त हुआ। 2 वर्ष 1 महीने और 26 दिन सजे सिंहासन का सुख भोगने के बाद महाराजा मानवेन्द्र शाह आम नागरिकों की श्रेणी में आ गए। सन् 1969 में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने सम्पूर्ण भारत में देशी रजवाड़ो के राजाओं और नवाबों के विशेषाधिकार छीन लिए और प्रिवी पर्स (निजी खर्च) बन्द कर दिए।


    स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश ने अंगड़ाई ली। देश में सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतत्रात्मक गणराज्य की स्थापना हुई। 1947 से 1952 तक अंतरिम संसद रही। 1952 में प्रथम आम चुनाव हुआ। टिहरी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से राजमाता कमलेन्दुमति शाह (महाराजा मानवेन्द्र शाह की माता) बहुमत से संसद सदस्य निर्वाचित हुईं। बाद में 1957, 1962, 1967 के आमचुनावों में राजा साहब ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में संसद में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। कुछ समय आप आयरलैन्ड में भारत के राजदूत रहे। इनके मंझले भाई कुँवर शार्दूल विक्रम शाह भी कई देशों में भारत के राजदूत रहे। कुछ समय आप नेहरू जी के व्यक्तिगत स्टाफ में भी रहे।


    बाद के वर्षों में आप काँग्रेस छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में आ गए। भा.ज.पा. प्रत्याशी के रूप में भी आपने तीन बार टिहरी निर्वाचन क्षेत्र से लोक सभा में प्रतिनिधित्व किया। इनकी गिनती देश के श्रेष्ठ और अनुभवी सांसदों में की जाती थी। 'पृथक उत्तराखण्ड' की आवाज सर्वप्रथम 1952 में श्री शाह ने ही उठाई थी। पृथक उत्तराखण्ड राज्य बन जाने से आपका सपना साकार हुआ। 5 जनवरी 2007 पंचतत्व में विलीन हुए।

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