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    बृजेन्द्र लाल शाह

    brijendra lal sah

    ब्रजेन्द्र लाल शाह एक कवि गीतकार, प्रख्यात रंगकर्मी, नाटककार थे उनका जन्म 13 अक्टूबर, 1928 को अल्मोड़ा नगर में हुआ था। तथा ब्रजेन्द्र के पिता गोविन्द लाल पेशे से चिकित्सक थे तथा साहित्यक तथा कलात्मक प्रवृति के थे। नाटको के प्रति रूचि व संस्कार उन्हे पिता से ही प्राप्त हुए थे। ब्रजेन्द्र की माता का नाम नन्दी देवी था। माता की मधुर आवाज में सुने लोकगीतो ने उनके मन में लोक गीतों के प्रति आकर्षण पैदा किया। अल्मोड़ा से इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की बाल्यकाल से ही लोक कला तथा रंगमंच के प्रति के प्रति उनका गहरा रूझान था। फिर वे लखनऊ पढ़ाई के लिए गये किन्तु 1948 में वापस लौट आए अल्मोडा लौटकर नाटक लिखे।


    ब्रजेन्द्र छात्र जीवन से ही कविताओं की रचना करने लगे थे। मधुर कण्ठ तथा प्रभावशाली प्रस्तुति से वे अपने साथी श्रोताओं (सहपाठियों) को मंत्रमुग्ध कर देते थे । 1949 में सुमित्रानन्दन पन्त उनकी काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद ले गये तथा उन्हें प्रवेश दिलाकर काव्य सृजन की और प्ररित किया। ब्रजेन्द्र सुमित्रानन्दन पन्त से बहुत प्रभावित थे पन्त के ही साथ ब्रजेन्द्र को हरिवंशराय बच्चन रामकुमार वर्मा आदि से मिलने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ।


    ब्रजेन्द्र जब इलाहबाद में अध्ययनरत तभी से काव्य रचना के साथ ही साथ रेडियो रूपक अदि का लेखन करने लगे थे उनके इस कार्य में हिन्दी के दिग्गज कवियो ने उन्हे सहयोग प्रदान किया। इलाहबाद में रहते हुए ही उन्होने "चैराहे की आत्मा" नामक नाटक का लेखन तथा मंचन व निर्देशन किया 1950 में राहुल सांकृत्यायन से मिले। राहुल ने ब्रजेन्द्र के सहयोग से एक रूपक "पर्वतश्री" प्रसारित किया गया। इसमें छपेली गीत ब्रजेन्द्र द्वारा गाया गया। संम्भवतः ब्रजेन्द्र की पीढी द्वारा प्रस्तुत प्रथम लोकगीत था।


    इन्होंने 1939 में अल्मोडा में "उदयशंकर इण्डिया कल्चर सेंटर" की स्थापना की थी। कुमाऊँ के "घसियारी नृत्य" को विश्व के उत्कृष्ट नृत्यों की श्रेणी में रखने का श्रेय भी उदयशंकर इण्ड़िया कल्चर को जाता है। यद्यपि यह सेंटर केवल पांच वर्षों तक ही कार्य कर पाया तथा 1944 में यह बन्द हो गया। किन्तु इस सेन्टर ने अल्मोडा के सांस्कृतिक क्रियाकलापों पर दूरगामी प्रभाव डाला "उदयशंकर इंडिया कल्चर सेंटर" के बन्द होने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में सांस्कृतिक गतिविधियाँँ बढ गयी, विद्यालयों में नाटक किये जाने लगे व सांस्कृतिक क्रियाशीलता विकसित होती गयी।


    1951-52 में मोहन उप्रेती और लेनिन पंत आदि के अल्मोडा आने से रंगकर्म का सिलसिला पुनः प्रारम्भ हो गया। इन्ही रंगकर्मियों ने ब्रजेन्द्र लाल शाह के साथ मिलकर "दि यूनाइटेड आर्टिस्ट, अल्मोडा" नामक संस्था की स्थापना की। कुछ समय पश्चात इस संस्था का नाम बदलकर "लोक कलाकार संघ" कर दिया गया। ब्रजेन्द्र प्रारम्भ से अन्त तक इस संस्था से जुडे रहे। ब्रजेन्द्र ने संस्था द्वारा प्रस्तुत नाटकों व मंचित नाटकों की रचना की तथा लोकगीतों का संकलन किया।


    1953 में यूनाइटेड आर्टिस्टस का अल्मोड़ा में गठन हुआ। लोक कलाकार के संघ को शाह ने अनेक लोकगीत दिये इनमें कुछ गीतों की धुन सेना के बैंड में भी शामिल है। 1954 में ब्रजेन्द्र की प्रथम नियुक्ति कपकोट में हुई। उसी वर्ष जोहार तथा मल्ला दानपुर के स्त्री पुरूष कलाकारों को दिल्ली गये तथा कुमाऊनी संस्कृति की थातों के कुछ अंशो का प्रदर्शन किया। इन कलाकारों के सम्पर्क में रहकर उनसे दानपुर व जोहार के कई लोकगीत ब्रजेन्द्र ने सीखे।


    कपकोट में नियुक्ति ब्रजेन्द्र के सांस्कृतिक व्यक्तित्व के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। वही उन्होने बाली-कुसुमा,सिदुवा-बिदुवा,रमौलतथ, भाना-गंगनाथ की लोकगाथाएं संकलित की। गंगनाथ की लोकगाथा को उन्होने 1955 मे लघु गीत नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया जो एक सफल प्रयास रहा। रमोला महागाथा का संकलन कार्य भी ब्रजेन्द्र द्वारा इन्ही दिनों किया गया।


    सरकारी सेवा में होने के उपरान्त भी ब्रजेन्द्र सांस्कृतिक संस्थाओं यथा "लोक कलाकार संघ", "पर्वतीय कला केन्द्र" आदि से गहराई से जुडे तथा कपकोट प्रवास के दौरान अनेक लोक गीतों को सीखा समझा तथा संकलित किया। लोक संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिये 1955 में प्रथम बार कपकोट विकासखण्ड में लोक गायकों व नर्तको की प्रतियोगिता का आयोजन कर उन्हे पुरस्कृत किया। प्रसिद्ध लोक गायक मोहन सिंह रीठागाड़ी को भी इस मेले में ब्रजेन्द्र द्वारा आमंत्रित किया गया जिन्होने वहाॅ मालूशाॅही गाथा का गायन किया।


    मेले के दौरान मोहन सिंह रीठागाडी द्वारा सिखाये गये गीतो व धुनो को ब्रजेन्द्र ने आत्मसात कर लिया कुमाऊँ तथा गढ़वाल के जिन गायककों ने ब्रजेन्द्र को प्रशिक्षित किया उनको व मुक्त कंठ से स्वीकार करते है। अपने सांस्कृतिक जीवन में 1957 से 1962 तक के समय को ब्रजेन्द्र अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते है। इसे वे स्वयं स्वीकार करते हैं। वे 6-7 महीने तक अपने कार्यस्थल से दूर लोक गीतों की खोज में भटकते रहते थे।


    "मेरा प्रारम्भिक लक्ष्य" पर्वतीय क्षेत्र में प्रचलित प्राचीनतम लोकगीतों को खोजना ध्वनि आलेखित करना तथा सीखना था उसके लिये में दिन देखता न रात न चिलचिलाती दुपहरी और न सीमान्त प्रदेश की अविरल बरसात। विलंबित लय के अनेक ऐसे गीत भी मुझे मिले जिनको मुखरित हुए सम्भवतः तीन चार सदियाँ बीत चुकी होंगी।


    ब्रजेन्द्र ने अपने शोध को केवल ग्रंथों तक सीमित न रखकर माटी से मंच तक की ओर ले जाने मे स्वयं को "लोक कलाकार संघ" संस्था से जोड लिया। ब्रजेन्द्र के शोध तथा लोक कलाकार संघ के सानिध्य ने इस लोक सांंस्कृतिक यात्रा को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय फलक तक पहुंचा दिया। ब्रजेन्द्र ने न केवल विलुप्त होते लोकगीतों को खोज निकाला अपितु जो गीत दो चार पंक्तियों के ही उपलब्ध थे उन गीतो की पुनर्रचना भी उनके द्वारा की गई। यथा-पारा रे भीडा को छै घस्यारी इस गीत के दो ही छन्द उपलब्ध थे। गीत के अन्य छन्द ब्रजेन्द्र ने ही लिखे -


    ब्रजेन्द्र द्वारा रचित पंक्तियाँ


    भैसी छौ मेरी दीदी के प्यारी थोरी छो भागी मैकणी प्यारी।
    भैसी गत्याली दूध पिवाली मालू ए तै मालू काटण दे मालू।
    के छू वे तेरी दीदी को नाम वी कै मरदा के करूं काम।
    वी थै कूॅलो तेरी चोरी लडै़ता मालू तै मालू नी काट।


    इसी प्रकार "बेडु पाको बारा मासा" गीत की प्रारम्भिक उपलब्ध पंक्तियों को कवि चन्द्रलाल वर्मा की बतलाई न्यौली गीतों की पक्तियों को जोडकर पूर्ण किया।


    रौ की रौतेली लै माछी मारी गीडा,
    तेरो खुटो काना बुडो मेरो खुटा पीडा,
    हो नरैण मेरो खुटा पीडा,..........................


    इसी प्रकार ब्रजेन्द्र ने लोकगीतो की पुर्नरचना के अन्तर्गत "नी बास घुघुती रूण-झूण" मूल गीतो को इस प्रकार रचा कि वास्तविक मौलिक लोकगीत ही लगता है। पर्वतीय सांस्कृतिक विरासत को आगे बढाते हुए ब्रजेन्द्र ने प्रमुख लोकगायको की विवेचना से संबधित कुछ कृतियां लिखीं। इन कृतियो में कुमाऊँनी लोक साहित्य लोक कलाकारों के जीवन पर गहरी अन्र्तदृष्टि डाली गयी है। जो लोक की थात की पहचान करने तथा उसका विकास करने वो महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगी।


    उत्तराखण्ड की लोक सांस्कृतिक विरासत व सांस्कृतिक आंदोलन को आगे बढाने में ब्रजेन्द्र का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। ब्रजेन्द्र ने कुमाऊँनी लोक गीतों, श्रम गीतों, सामाजिक पृष्ठभूमि आदि का प्रभावशाली वर्णन किया है। उत्तराखण्ड के विलुप्त लोक धुनों को एकत्रित करना दुष्कर कार्य था। ब्रजेन्द्र ने अपनी सेवा के दौरान दूर दराज के गांवों में जाकर चाहे एक दो पंक्तियां ही सही एकत्रित की।


    ढाई वर्षों में उन्होने दो हजार लोकगीतोंं की प्रथम पंक्तियां एकत्रित की एकत्रित धुनों व लोक गीतों के बिम्बो व व्यक्त भावो को बटोरा, लोकगीतों की धुनो का वर्गीकरण किया इस प्रकार कुल एकत्रित 2000 धुनो में से लगभग 200 धुनों का प्रयोग किया है तथा 480 गीतों में कुमाऊनी तथा 480 गीतो में गढ़वाली रामलीला लिखी। लोक कला के संरक्षण तथा संवर्धन का यह कार्य बहुत सराहनीय था। इससे सांस्कृतिक आन्दोलन को एक नया आयाम प्राप्त हुआ। लोक कला को आगे बढ़ाने के इन कार्यों में ब्रजेन्द्र ने स्वयं व्यक्तिगत रूप से मंथन निर्देशन गायन की जिम्मेदारी ली तथा आवश्यकता पडने पर अभिनय भी किया।


    वे स्वयं संस्मरण में लिखते हैं। मैंने माटी से गीत लिये थे और वहाँ से चला था मंच की ओर बहुत प्रयास किया इसके लिये। लेकिन मंच से माटी की ओर लोक संगीत अब नये कथानक का बाना पहनकर स्वयं ही लौट पड़ा। यह ब्रजेन्द्र की बहुत बडी सफलता थी कि जिस लोक की थात के संरक्षण का वे प्रयास कर रहे थे वह लोक तक पहुॅंच भी रही थी।


    लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिये उन्होने संचार साधनों, रेडियो का भी सहारा लिया तथा विभिन्न रूपकों के माध्यम से अनेक स्थानों से लायी गयी सामग्री को प्रस्तुत किया यथा-भेसू पंगत्याणा माणी कम्पासी, एक शिखर एक अलगोझा आदि। लोक संस्कृति को मंच पर लाने तथा उसे जीवित रखने के प्रयासो में ब्रजेन्द्र लाल शाह को मोहन उप्रेती जैसे जुझारू संस्कृतिकर्मी का साथ मिला जिससे इस ओर प्रयासो में एक संस्था का जन्म हुआ। "पर्वतीय कला केन्द्र" नामक इस संस्था ने ब्रजेन्द्र के अथक परिश्रम तथा लोक संस्कृति को बचाने के प्रयासो को नया कलेवर प्रदान किया। ब्रजेन्द्र द्वारा रचित गीत नाटिकाओं ने पर्वतीय कला केन्द्र के कार्यक्रम को नया मोड दिया साथ ही उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के संरक्षण तथा विस्तार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुमांऊ की प्रमुख लोकगाथाओं को प्रभावशाली रूप में प्रथम बार मंच के लिए प्रस्तुत करने का श्रेय ब्रजेन्द्र लाल शाह को प्राप्त है। ब्रजेन्द्र लाल शाह ने बहुप्रचलित लोकगाथाओं पर आधारित आठ गीत नाटकों-राजुला मालूशाही, अजुवा-वफौला, रसिक रमौल, गंगानाथ, हरूहीत भोलानाथ, गारीधना तथा गोरिया की रचना की थी।


    ब्रजेन्द्र द्वारा रचित सभी गीत नाटकों का मंचन किया जा चुका है। इप्टा वामंपथी विचारों से प्रभावित एवं प्रेरित होकर सांस्कृतिक आन्दोलन में अपना योगदान देने हेतु कुमाऊँ के लोक जीवन और यहाँ के लोक साहित्य को जन जागृति का रूप देने हेतु गीत नाटको, विलुप्त होती धुनों के संरक्षण को प्रवृत्त हुएं इन रचनाओं को पुनर्जीवित करने का उद्देश्य मात्र मनोंरजन नही था। अपितु जनता में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति प्रेम ज्ञान बढाना साथ ही सामाजिक के प्रति चेतना विकसित करना तथा एक सामाजिक आर्थिक व सांस्कृतिक रूप से समान समाज की रचना हेतु प्रेरित करना था।


    ब्रजेन्द्र का स्वयं स्पष्टतः यह मानना था कि "लोक संस्कृति सामाजिक चेतना का सबसे संवेदनशील बिन्दु है और इसी कारण सामाजिक क्रान्ति का सशक्त माध्यम, हमारे रंगमंचीय प्रस्तुतिकरणों के पीछे जिस समाज की कल्पना है वह सार्वभौम समानता व शोषणविहीन सिद्धान्तों पर आधारित है कला का अर्थ व्यक्ति की अन्तश्चेतना को जगान है। हम ऐसा समाज चाहते जहां व्यक्तिगत, सामाजिक व आर्थिक समानता हो।"


    अपने अभावों-रिक्तियों के प्रति गहन संवेदनशीलता प्रदान कर लोगो को सजग करने में सांस्कृतिक माध्यम की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज का अभाव ग्रस्त शिक्षित बेरोजगार युवक ही आने वाले भारत के आर्थिक-सामाजिक ढांचे मंे बदलाव करेगा, और कलाकार उस क्रान्ति के अनुपूरक बनेगें। यदि पर्वतीय क्षेत्रों में हमें नारी समस्या, बेरोजगारी व सामान्ती शोषण दूर करने है तो इन्ही सांस्कृतिक माध्यमों की शरण में जाना होगा साहित्य-कला-रंगमंच के माध्यम से जब हम विचार देते है तो वह अभिव्यक्ति का ही समग्र रूप होता है।


    ब्रजेन्द्र स्वयं तो लोकसंस्कृति को सजाने संवारने व जीवित रखने के लिये प्रयत्नरत रहे साथ ही आगे आने वाले संस्कृति कर्मियों (जिनमें गिर्दा प्रमुख थे) को एक पृष्ठभूमि व प्रेरणा प्रदान की। ब्रजेन्द्र लाल शाह ने उत्तराखण्ड में सांस्कृतिक आन्दोलन को एक नयी दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

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