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    वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली

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    चन्द्र सिंह गढ़वाली

     जन्म:  दिसम्बर 25, 1891
     जन्म स्थान:  गाँव माँसी सैणीसेरा, गढ़वाल
     पिता:  श्री जाथली सिंह
     माता:  -
     पत्नी:  श्रीमती भागीरथी देवी
     बच्चे:  3 पुत्रियाँ, 2 पुत्र
     व्यवसाय:  सैनिक
     पद:  मेजर हवलदार
     यूनिट:  2/39 गढ़वाल रायफल्स, 6 कम्पनी
     युद्ध:  प्रथम विश्वयुद्ध, बगदाद की लड़ाई
     मृत्यु:  अक्टूबर 01, 1979

    चन्द्र सिंह गढ़वाली (1891-1979): गाँव माँसी सैणीसेरा, चौथान पट्टी, गढ़वाल। इतिहास प्रसिद्ध पेशावर काण्ड के नायक, अटूट देशप्रेमी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संघर्षशील व्यक्तित्व, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित नाम। गाँधी जी के शब्दों में-"मुझे एक चंद्र सिंह और मिलता तो भारत कभी का स्वतंत्र हो गया होता।"


    शिक्षा


    वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का बाल्यकाल विद्यार्थी जीवन से होकर नहीं गुजरा था। इसका मुख्य कारण पारिवारिक गरीबी था, श्री कुँवर सिंह नेगी 'कर्मठ' लिखते है कि चन्द्र सिंह के पिता श्री जाथली सिंह अपने पुत्र की शिक्षा-व्यवस्था करना चाहते थे, परन्तु स्कूल के अभाव में वे ऐसा नहीं कर सके। आर्थिक विपन्नता के कारण वे अपने पुत्र को किसी दूर के स्कूल में भी नहीं भेज सके थे। गाँव के थोकदार जब अपने बच्चों को लिखना-पढ़ना सिखलाते थे, तो ये भी कुछ बातों को सुनकर हृदयगम कर लिया करते थे। फिर कुछ समय तक इन्होंने एक ईसाई अध्यापक से दर्जा 2 तक पढ़ना-लिखना सीख लिया था। कर्मठ जी ने आगे लिखा है कि पढ़ने-लिखने में इनका मन नहीं लगता था। क्योंकि ये बचपन में बहुत नटखट तथा चंचल थे। शरीर से हृष्ट पुष्ट होने के कारण इन्हें 'भढ़' कहा जाता था। इस प्रकार इन्होंने अपने सम-वयस्क बालक-बालिकाओं के दल का नेतृत्व संभाल लिया था और उत्पातों से भरपूर अल्हड़ जीवन बिताते रहे।


    किशोरावस्था


    वीर चन्द्र सिंह 'गढ़वाली' के बाल्यकाल की कुछ ऐसी घटनाएं है, जिन्हें स्मरण करने पर ज्ञान होता है कि वे कितने उन्मुक्त एवं स्वतंत्र प्रकृति के व्यक्ति थे। घर आँगन में बच्चों का खेल हो अथवा ग्वाल-बालों के साथ की उधम चौकड़ी हो। कहा जाता है कि किशोर चन्द्र सिंह हर जगह मुखिया बना रहता था। श्री भक्तदर्शन लिखते हैं कि 'बचपन में श्री चन्द्र सिंह उत्पातों से भरपूर अल्हड़ जीवन बिताते रहे। (गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां पृष्ठ-356)। गढ़गौरव के सम्पादक श्री कुँवर सिंह नेगी 'कर्मठ' लिखते हैं, उन्हीं दिनों एक बार सेरा-सवाई हो रही थी, समस्त ग्रामवासी मिलकर इनके खेतों में धान की रोपाई कर रहे थे। उन सबके लिए इनके घर में अच्छे स्वादिष्ट भोजन तैयार किए गए। इन्होंने एक लड़की से विवाह का स्वांग रचा और अपनी सारी बारात के साथ उस दावत का भोजन जंगल में लगा दिया। परिणाम यह हुआ कि रोपाई से लौट आने के बाद ग्रामवासियों के लिए दोबारा भोजन पकाना पड़ा। कुछ दिन बाद इसी लड़की से इनकी शाद भी हो गई। यह लड़की इनसे दो वर्ष बड़ी थी।('वीर चन्द्र सिंह की आत्मकथा' पृष्ठ-12)


    अंग्रेजो के दुर्व्यवहार को देखकर किशोर चन्द्र सिंह मन ही मन बहुत क्षुब्ध रहता था। परन्तु घर की गरीबी और प्रतिकूल परिस्थितियों के भाग्यविधाता कारण एक किशोर समय की प्रतीक्षा के लिए मजबूर था। उन दिनों सारे गढ़वाल-कुमाऊँ में ब्रिटिश राज का दौर था, बेगार-बर्दयाश की कुप्रथाएं प्रचलित थी। एक बार एक मुर्गियों का बड़ा टोकरा, चन्द्र सिंह को एक पड़ाव से दुसरे पड़ाव तक पहुँचाना पड़ा था।


    वैवाहिक जीवन


    चन्द्र सिंह ने बाल्यावस्था में जो विवाह किया था, उनसे उनकी कोई संतान नहीं हुई। इनके पिता ने इनकी दूसरी शादी की। उनसे इनकी एक कन्या हुई। विवाह होने पर उस लड़की का एक लड़का हुआ जो भावर सिमलचौड़ में बसागत है। अल्मोड़ा के ग्राम मैंगणी के एक हवलदार की कन्या से किया। हवलदार जी ने अपनी सारी जमीन-जायदात इन्हें दान में दे दी। तीसरे विवाह से चन्द्र सिंह की कोई संतान नहीं हुई। इनके पिता श्री जाथली सिंह अपने पुत्र की संतान के प्रति बहुत चिन्तित रहते थे। इस कारण उन्होंने अपने पुत्र श्री चन्द्र सिंह की चौथी शादी सन् 1929 में राउँगांव पट्टी, चौपड़ाकोट, पौड़ी गढ़वाल से की। इनकी चौथी पत्नी का नाम भागीरथी देवी था, जो विवाह के समय लगभय 12-13 साल की थी। ('वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की आत्मकथा' पृष्ठ -72) विवाह के समय चन्द्र सिंह एक सैनिक के रूप में पेशावर में थे और घर में घड़े के साथ गणेश पूजन कर उनका विवाह हो गया था। इनकी पहली पत्नी का कुछ समय के पश्चात् निधन हो गया था। साथ ही इनके 10-11 साल के जेल जीवन के समय दो पलियां घर छोड़कर अपने मायके चली गई थी। चौथी पत्नी श्रीमती भागीरथी देवी जिन्होंने अपने पति के मुख दर्शन भी नहीं किये थे वे अत्यन्त पति परायणा थी तथा अपने पति के नाम पर ससुराल में ही रहने लगी। इनसे गढ़वाली जी के चार बच्चे हुए - माधुरी और क्रांतिज्वाला दो कन्यायें तथा आनन्द चन्द्र गढ़वाली तथा खुशहाल चन्द्र गढ़वाली दो पुत्र। श्रीमती भागीरथी देवी का जीवन भी बड़े संकटों से होकर गुजरा था। गढ़वाली जी के जेल से छूटने के बाद श्रीमती भागीरथी देवी कई वर्षों तक उनके साथ काण्डई गाँव, पौड़ी में भूखी-प्यासी रही।


    सेना में भर्ती


    चन्द्र सिंह गढ़वाली जी जिस समय 22 वर्ष के थे, उस समय प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया था। बड़े पैमाने पर सेना में भर्ती होने लगी थी।भक्तदर्शन ने अपनी पुस्तक 'गढ़वाल की दिवंगत विभूतियों' में लिखा है कि 'एक भर्ती करने वाला गढ़वाली हवलदार इनके गाँव पहुँच गया। इन्हें सेना में भर्ती होने का एक सुनहरा अवसर दिखाई दिया। ये भागकर उस भर्ती करने वाले हवलदार के पीछे-पीछे हो लिए और उसके साथ ढाईज्यूली तथा पौड़ी के रास्ते लैंसडौन छावनी पहुँच गए। 11 सितम्बर, 1914 को इन्हें लेंसडौन स्थित गढ़वाली फौज में भर्ती कर लिया गया और 2/39 गढ़वाली राइफल्स की छटी कम्पनी की बारहवीं सेक्शन में रख लिया गया। हट्टे-कट्टे जवान होने से इन्होंने फौजी ट्रेनिंग में शीघ्र ही सफलता हासिल कर ली और नौ महीने बाद कसम खाकर पूरे सिपाही बन गए। कुँवर सिंह नेगी 'कर्मठ' लिखते हैं - 'ये दिन भर सैनिकों के साथ कुछ न कुछ बोलते रहते थे। इसलिए इनके साथी सैनिक इन्हें व्यंग में 'चन्द्रीभाट' कहा करते थे।'


    प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अगस्त,1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने सैनिक साथियों के साथ योरोप और मध्य-पूर्वी क्षेत्र में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी निभाई। अक्टूबर में स्वदेश लौटे। पुनः 1917 में अंग्रेजों की ओर से मोसापोटामिया में युद्ध में भाग लिया। 1921-23 की अवधि में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में रहे जहाँ अंग्रेजों और पठानों के मध्य युद्ध हो गया था। 1920 के बाद चन्द्र सिंह देश में घटित राजनैतिक घटनाओं में रुचि लेने लगे। 1929 में गाँधी जी कुमाँऊ भ्रमण पर आए। चन्द्र सिंह उन दिनों छुट्टी पर थे। वे गाँधी जी से मिलने बागेश्वर पहुंचे और गाँधी जी के हाथ से टोपी लेकर जीवन भर उसकी कीमत चुकाने का प्रण लिया।


    पेशावर कांड


    1930 में इनकी बटालियन को पेशावर जाने का हुक्म हुआ। 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में किस्साखानी बाजार में खान अब्दुल गफ्फार खान के लालकुर्ती खुदाई खिदमदगारों की एक आम सभा हो रही थी। अंग्रेज आजादी के इन दीवानों को तितर-बितर करना चाह रहे थे, जो बल प्रयोग से ही सम्भव था। अंततः कैप्टेन रिकेट 72 गढ़वाली सैनिकों को लेकर जलसे वाली जगह पर पहुंचा और निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का हुक्म दिया। चन्द्र सिंह भण्डारी (गढ़वाली) कैप्टेन रिकेट की बगल में ही खड़े थे। तत्काल उन्होंने 'सीज फायर' का हुक्म दिया और सैनिकों ने अपनी बन्दूकें नीचे कर दीं। चन्द्र सिंह ने कैप्टेन रिकेट से कहा- "हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते।" इसके बाद गोरों की फौजी टुकड़ी से गोली चलवाई गई। चन्द्र सिंह का और गढ़वाली पल्टन के उन जांबाजों का यह अदभुत और असाधरण साहस था और ब्रिटिश हुकूमत की खुली अवहेलना और विद्रोह था। सरकार ने इस हुक्मअदूली को राजद्रोह करार दिया। फलस्वरूप सारी बटालियन एबटाबाद (पेशावर) में नजरबन्द करदी गई। उन पर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया। हवलदार 253 चन्द्र सिंह भण्डारी (गढ़वाली) को मृत्यु दण्ड की जगह आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। 16 व्यक्तियों को सख्त लम्बी सजाएं हुई। 39 व्यक्तियों को कोर्ट मार्शल द्वारा नौकरी से निकाला गया। 7 अन्य लोगों को बाद में मिलेट्री से बरखास्त किया गया। इन सभी का सारा संचित वेतन जब्त कर दिया गया। यह फैसला मिलेट्री कोर्ट मार्शल द्वारा 13 जून, 1930 को ऐबटाबाद छावनी में सुनाया गया। बैरिस्टर मुकुन्दी लाल ने गढ़वालियों की ओर से मुकदमें की पैरवी की थी। चन्द्र सिंह गढ़वाली तत्काल ऐबटाबाद जेल भेज दिए गए।


    स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान


    26 सितम्बर, 1941 को 11 साल, 3 महीने, 18 दिन जेल जीवन बिताने के बाद रिहा हुए। ऐबटाबाद, डेरा इस्माइल खाँ, बरेली, नैनीताल, लखनऊ, अल्मोड़ा और देहरादून की जेलों में गढ़वाली ने यातनाएं झेली। नैनी जेल में उनकी भेंट क्रान्तिकारी राजबंदियों से हुई। लखनऊ जेल में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से भेंट हुई। गढ़वाली एक निर्भीक देशभक्त थे। वे बेड़ियों को 'मर्दो का जेवर' कहते थे। जेल से रिहा होने के बाद कुछ समय 'आनन्द भवन' इलाहाबाद में रहने के बाद 1942 में अपने बच्चों के साथ वर्धा आश्रम में रहे। भारत छोड़ो आन्दोलन में उत्साही नवयुवकों ने इलाहाबाद में उन्हें अपना कमाण्डर-इन-चीफ नियुक्त किया। डा. कुशलानन्द गैरोला को 'डिक्टेटर' बनाया गया था। इसी दौरान वे फिर पकड़ लिए गए और 6 अक्टूबर, 1942 को उन्हें सात साल की सजा हुई। नाना जेलों में कठोर यातनाएं सहते 1945 में जेल से छोड़ दिए गए, लेकिन उनके गढ़वाल प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया। गढ़वाली का जेल प्रवास में ही क्रान्तिकारी यशपाल से परिचय हो गया था। जेल से रिहाई के बाद कुछ दिन वे यशपाल के साथ लखनऊ में रहे। तत्पश्चात अपने बच्चों को मिलने हल्द्वानी आ गए। गढ़वाली पर अब समाज का बड़ा प्रभाव पड़ा। जेल प्रवास में ही वे आर्यसमाजी हो गए। इस बीच उन्होंने कम्युनिष्ट विचारों को अपनाया और 1944 मे कम्युनिष्ट कार्यकर्ता के रूप में सामने आए। 1946 में गढ़वाली ने गढ़वाल में प्रवेश किया, जहां स्थान-स्थान पर जनसमूह ने उनका भव्य स्वागत किया। कछ दिन गढ़वाल में रहने के पश्चात वे किसान कांग्रेस में भाग लेने लुधियाना चले गए और वहां से लाहौर पहँचे। दोनों जगहों पर उनका भारी स्वागत हुआ। टिहरी रियासत की जनक्रान्ति में भी चन्द्र सिंह गढ़वाली की सक्रिय भूमिका रही है। नागेन्द्र सकलानी के शहीद हो जाने के पश्चात गढ़वाली ने आन्दोलन का नेतृत्व किया। कम्युनिष्ट विचारधारा का व्यक्ति होने के कारण स्वाधीनता के बाद भी भारत सरकार उनसे शंकित रहती थी।


    आर्थिक स्थिति में सुधार आने के बाद इन्होंने अपने बच्चों को शिक्षा भी दिलवाई और कोटद्वार नगर में एक मकान भी बनवाया, जिसे इन्होंने किराये पर। चढ़ा दिया था। 1974 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा ने नियमों में विशेष छूट देकर, भावर के समीप ही वन विभाग की बहुत सी भूमि तथा मकान इन्हें दिलवा दिया था। इसके बाद ये वहीं पर रहने लगे। ध्रुवपुर वाली जमीन इन्होंने कुछ तो बेच दी थी और कुछ अपनी लड़कियों को दे दी थी तथा कुछ लड़कों के नाम छोड़ दी थी। लगभग दो बीघा जमीन इन्होंने मूर्तिकार प्रोफेसर अवतार सिंह पँवार को मूर्ति लगाने तथा उद्योग खोलने के लिए दान में दी थी।


    मृत्यु


    उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी, वीर चन्द्र सिंह। गढ़वाली का बहुत सम्मान करते थे। उनके मुख्य मंत्रीत्वकाल में ही गढ़वाली जी ने दूधातोली क्षेत्र के कोद्याबगढ़ में अपनी समाधि के लिए 6x6 फीट जमीन स्वीकृत करा ली थी।


    अगस्त 1979 में जब वे कोटद्वार में बहुत बीमार पड़ गए तो उन्हें कोटद्वार चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। कुँवर सिंह नेगी 'कर्मठ' अपनी पुस्तक 'वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली की आत्मकथा' में लिखते हैं कि तत्कालीन वित्त मंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा को जब पता चला कि 'गढ़वाली' बहुत बीमार हैं तो उन्होंने अपनी कार कोटद्वार भेजी और इन्हें डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल दिल्ली में भर्ती करा दिया। वे समय-समय पर इनकी देखभाल के लिए भी आते रहते थे। वे 'गढ़वाली' का बहुत आदर करते थे और सभाओं में उनका गुणगान किया करते थे।


    डॉ. राममनोहर लोहिया, विलिंगटन अस्पताल दिल्ली में गढ़वाली जी का सर्वोतम इलाज हुआ, परन्तु इनके वृद्ध और जर्जर शरीर को अब बचाना मुश्किल था। आखिर 1 अक्टूबर 1979 को 87 वर्ष की अवस्था में इन्होंने संसार से विदाई ले ली। इनके शव पर देश के प्रमुख नेताओं ने फूल मालाएं। चढ़ाई और शोक-संदेश भेजकर श्रद्धांजलियाँ अर्पित की। बहुगुणा जी ने इनके अंतिम संस्कार में विशेष रूप से योगदान दिया। उत्तर प्रदेश शासन ने इनकी भस्मी दूधातोली पहुँचाने की व्यवस्था की। भरतनगर योजना' नामक पुस्तक का गढ़वाली की इच्छानुसार बहुगुणा ने 1 अक्टूबर 1979 को इनके दाह संस्कार के समय दिल्ली के शमशान घाट में विमोचन किया और पुस्तक को इनकी छाती में रखकर दाह संस्कार में जला दिया।

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