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    सेब

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    सेब

     वैज्ञानिक नाम:   मेलस डोमेस्टिका
     जगत:  पादप


    शीतोष्ण फलों में सेब अपने विशिष्ट स्वाद, सुगंध, रंग व अच्छी भण्डारण क्षमता के कारण प्रमुख स्थान रखता है। इसका उपयोग ताजे एवं प्रसंस्कृत उत्पादों जैसे- जैम, जूस, मुरब्बा, इत्यादि के रूप में किया जाता है। सेब में कार्वोहाइड्रेट, वसा-प्रोटीन, खनिज तत्वों के साथ-साथ अनेक विटामिन्स भी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत लाभप्रद हैं।


    जलवायु एवं भूमि


    सेब शीतोष्ण जलवायु का फल है। इसकी खेती समुद्र तल से 1500 से 2500 मीटर तक ऊॅंचाई वाले क्षेत्रों में की जाती है। इसकी सफल बागवानी के लिए 0.5 से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा 1000 से 1500 से.मी. वार्षिक वर्षा आवश्यक है। फूल खिलते समय (मार्च-अप्रैल) अधिक वर्षा तथा तापक्रम में उतार-चढ़ाव से उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।



    मिट्टी


    इसकी सफल खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली मटियार दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। अम्लीय भूमि जिसका पी.एच. 5.5 से 6.0 हो उपयुक्त होती है, क्षरीय एवं कंकरीली/पथरीली भूमि इसकी खेती के लिए अनुपयुक्त होती है।



    उत्तरांचल में पायी जाने वाली प्रमुख प्रजातियों का वर्गीकरण


    (1) शीघ्र पकने वाली - अर्लीअनवरी, फैनी, बिनौनी, चैबटिया, प्रिंसेज एवं चैबटिया अनुपम।
    (2) मध्य में पकने वाली - स्र्टाकिंग, डेलीअस, राॅयल डेलीसस, रेड डेलीसस, रेड गोल्ड, ब्यूटी ऑफ बाॅथ, रोम ब्यूटी, कोर्ट लैण्ड, रेड फ्यूजी, बेवर्न, जोनाथन, गोल्डेन डेलीसस।
    (3) देर से पकने वाली - रायमर, वर्किघम।
    (4) स्पर प्रजातियाॅं - रडे एवं स्टार।
    (5) परागणकर्ता किस्में - रेड गोल्ड, गोल्डेन डेलीसस।


    उद्यान विभाग द्वारा विकसित प्रजातियाॅं (उत्तरांचल)


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    चैबटिया, प्रिन्सेज, चैबटिया अनुपम, चैबटिया स्वर्णिमा, चैबटिया अनुराग।
    उपरोक्त सभी प्रजातियों के सेब पकने के बाद उनकी तोड़ाई की जाती है। सभी प्रजातियाॅं जून से नवम्बर तक किस्मों तथा स्थान विशेष के अनुसार पकती रहती हैं। एक पेड़ की तोडाई 2-3 बार में 3-4 दिन के अंतर पर करनी अच्छी रहती है। तोड़ाई के वक्त फलों की बड़ी टोकरियों के नीचे घास या चीड़ की पत्तियाॅं (पीरूल) लगाकर श्रेणीकरण या छॅटाई स्थल तक पहुॅंचाया जाता है।


    फलों की तोड़ाई के उपरान्त उनका श्रेणीकरण करके इन्हें अन्य राज्यों में भेजा जाता है। श्रेणी किस्मों के आधार पर की जाती है। उच्च किस्मों के सेब से आय अधिक प्राप्त की जाती है। भारत सरकार के 'एग मार्क' योजना के अन्तर्गत सेब के आकार के अनुसार 'सुपर' 75 मि.मी., फैन्सी 70 मि.मी. तथा कामर्सियल 51 मि.मी. तीन वर्गो में विभाजित किया गया है। लेकिन इनमें आकार के अलावा अन्य बातें जैसे- रंग, दाग धब्बे इत्यादि का ध्यान रखा जाता है।

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