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    सोमवारी बाबा

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    सोमवारी महाराज (1808-1926): पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त के पिण्डदादन खाँ नामक स्थान में जन्म हुआ। हिमालय में अपनी दुःसाध्य तपश्चर्या से दैवी संपतियों को प्राप्त कर एक सन्त शिरोमणि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आपका मूल नाम किसी को मालूम न था। अल्मोड़ा से प्रकाशित "शक्ति" साप्ताहिक समाचार पत्र में प्रकाशित एक सूचना के अनुसार उच्चारण, आकृति, आचार-व्यवहार, स्मृति और शास्त्रानुसार महाराज जी सिन्धी प्रतीत होते थे। अतः अनुमान किया जाता है कि आपने अपने जन्म से सिन्ध हैदराबाद को पवित्र किया होगा। लेकिन विश्वासपूर्वक इस विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता है। सम्भव है आपका जन्मस्थल पिण्डदादन खाँ ही रहा हो। महाराज जी उच्च और सम्पन्न कुल के ब्राह्मण थे। आपके पिता उस समय जाने-माने बैरिस्टर थे।


    1900 के लगभग सोमवारी महाराज ने अपने पावन चरणों से उत्तराखण्ड की मिट्टी को पवित्र किया। कालजयी बाबा हैड़ाखान और सिद्ध पुरुष खाकी महाराज भी सन्त सोमवारी महाराज के समकालीन थे। इनकी साधना स्थली खगमरा कोट, अल्मोड़ा रही है। कुमाऊँ पहुँचकर महाराज जी ने कोशी नदी के तट पर काकड़ीघाट और पदमपुरी (पदमबोरी) में अपने साधना-स्थल (आश्रम) बनाए। तीर्थाटन व्रत पूर्ण कर आप कूर्मान्चल में तपस्या करने लगे। वहाँ से कई बार आप बद्रिकाश्रम गए। सोमवारी महाराज के विषय में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर श्री गोविन्द राम काला जी ने अपनी पुस्तक "The Memories of The Raj" के अध्याय "द हरमिट आफ पदमबोरी" के पृष्ठ 30-35 में लिखा है- "पूज्य सोमवारी गिरि के विषय में जहाँ तक मैं जानता हूँ, उनके गुरु एक मुस्लिम फकीर थे; जिनके दर्शन उन्हें पंजाब में सतलज नदी के तट पर हुए थे। उनके समान आध्यात्मिक शक्ति से पूर्ण दूसरे साधु बाबा हैड़ाखान थे।" सन 1937 के "कल्याण” के सन्त अंक में श्रीयुत श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने लिखा है कि - "सन्त सोमवारी जी सभी जाति और धर्म से सम्बन्धित थे। उनके शिष्यों में अल्मोड़ा के कई मुसलमान भक्त भी थे।” भारत की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को विदेशियों के समक्ष प्रकट करने का श्रेय पाल ब्रन्टन को जाता है। पाल ब्रन्टन ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तक "हिमालया इन सर्च आफ सीक्रेट इडिया" में इस दिव्य पृष्ठभूमि का वर्णन किया है।


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    दीन-दुखियों की सहायता करना, कर्तव्य बोध के प्रति प्रेरणा देना, देश सेवा के प्रति बालकों और युवाओं का उत्साह बढ़ाना, मनुष्यता के संवर्द्धन में सक्रिय सहयोग देना- सन्त सोमवारी महाराज का अक्षय कार्य था। डा. गिरिराज शाह, अवकाश प्राप्त पुलिस महानिरीक्षक ने "उत्तराखंड की अनन्य विभूति : सन्त सोमवारी महाराज" नामक 152 पृष्ठीय पुस्तक में महाराज जी के जीवन, आध्यात्मिक शक्ति एवं साधना पर पर्याप्त विस्तार से प्रकाश डाला है। कूर्मान्चल में इस आध्यात्मिक विभूति के हजारों शिष्य एवं भक्त हैं। कइयों के ये आराध्य देव हैं। कई एक परिवार और भक्त इनके आशीर्वाद से फले-फूले है। भारतीय राजनीति में धरती से चलकर शिखर चूमने वाले श्री नारायण दत्त तिवारी जी के आप आराध्य देव और प्रेरणा स्रोत रहे हैं। प्रत्येक सोमवार को भण्डारा करने पर स्थानीय जन मानस आपको सोमवारी महाराज कहकर सम्बोधित करता आया है। कल्याण 'सन्त विशेषांक', द्वितीय खण्ड, 14 सितम्बर, 1937 में भारत के समस्त सन्तों का उल्लेख किया गया है। उस सन्त संसद के सोमवारी महाराज अध्यक्ष प्रतीत होते हैं। समग्र शक्ति सम्पन्न होने के कारण हैड़ाखान महाराज ने प्रधान मंत्री पद सम्भाला था। अधिकांश सन्त सांसद दक्षिण भारतीय थे। किन्तु कार्यकारिणी, परामर्शदात्री समिति में अल्मोड़ा के खाकी महाराज, मोहन बाबा, गंगोलीहाट के लक्ष्मणदास, जंगम महाराज, हल्द्वानी के लटूरी महाराज, कैलाश आश्रम वाले युवा सन्त नारायण स्वामी और नान्तिन महाराज भी थे। गुजराती भाषा में लिखी काका कालेलकर की पुस्तक 'हिमालय प्रवास' में सोमवारी महाराज से वार्तालाप विषयक संस्मरण हैं। यह पुस्तक 1910 में निरंजन प्रेस, अहमदाबाद से प्रकाशित हुई थी। पुस्तक की एक प्रति खगमरा कोट, अल्मोड़ा के पुस्तकालय में भी उपलब्ध है।


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    यह भी एक अद्वितीय संयोग है कि गृहस्थी पिता और साधु पुत्र अपनी-अपनी योजनाओं के अनुसार बद्रीनाथ धाम पहुँचे। यहाँ पहुँचने पर पिता ने शरीर त्याग दिया। साधु पुत्र ने शव पहचान लिया। अंत्येष्टि संस्कार किया। ब्रह्म कपाल में विधिवत श्राद्ध भी किया। महाराज जी कहा करते थे कि मैं ब्राह्मण पहले हूँ फकीर बाद में। सोमवारी महाराज ने अल्मोड़ा के विख्यात शिक्षा शास्त्रियों, साहित्यकारों, देश भक्तों एवं प्रशासकों को अपने उद्देश्यों से उत्प्रेरित किया। इनके आशीर्वाद के फलस्वरूप भारत रत्न पंडित गोबिन्द बल्लभ पन्त, स्वतंत्रता सेनानी हरगोबिन्द पन्त, अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि सुमित्रानन्दन पन्त, प्रशासक और पूर्व राज्यपाल भैरव दत्त पांडे, उ.प्र. के पूर्व मुख्य सचिव, भैरव दत्त सनवाल, आई.सी.एस., पद्मश्री छत्रपति जोशी, पद्म विभूषण घनानन्द पांडे इत्यादि सज्जन अपनी ईमानदारी और सदाशयता के कारण स्वच्छ छवि के अधिकारी रहे हैं।


    1891 में स्वामी गंगाधर बंगाली (स्वामी अखंडानन्द), युवा नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) को लेने काठगोदाम पहुँचे। नैनीताल, काकड़ीघाट, लोधिया होते हुए अल्मोड़ा चल पड़े। काकड़ीघाट पहुँचकर सोमवारी महाराज की साधना स्थली में चबूतरे में पीपल वृक्ष के नीचे बैठे। बैठते ही चिल्लाए, "चिंतन और मनन के लिए क्या ही सुन्दरतम स्थान है" और देखते-देखते उनकी समाधि लग गई। चेतना लौटने पर कहने लगे "मुझे जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों की उपलब्धि हो गयी है, मैंने अखिल ब्रह्म से साक्षात्कार कर लिया है।"

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