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    शराबबंदी आन्दोलन - नशा नहीं रोजगार दों

    उत्तराखण्ड का इतिहास इस ओर इंगित करता है कि 1815 तक राजशाही का संपूर्ण उत्तराखण्ड में शासन था किन्तु इस क्षेत्र में शराब का आम जनता के बीच प्रचार लगभग नहीं के बराबर था। यद्यपि इस क्षेत्र में निवास करने वाली जनजातियां शौका, जाड़ मारछा, थारु, बोक्सा आदि परम्परागत रुप से इस व्यवसाय से जुड़ी थी किन्तु ब्रिटिश काल में 1880 के बाद सरकारी शराब की दुकानें खुलने के साथ ही यहाँ शराब का प्रचलन आरम्भ हो गया।


    'हिल स्टेशन' की स्थापना के बाद शराब के प्रचलन को उपनिवेशकाल में गति मिली। 1882 में जब शराब के प्रचलन के विषय में नकारात्मक टिप्पणी हुई तो तत्कालीन कमिश्नर रैमजे ने लिखा था - "ग्रामीण क्षेत्रों में शराब का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता और मुझे आशा है कि कभी नहीं होगा। मुख्य स्टेशनों के अलावा शराब की दुकानें अन्यत्र नहीं खुलने दी जायेंगी।" इससे पहले बैकेट ने अपनी 1863-73 की रपट में लिखा था कि कुमाऊँ में शराब पीने का प्रचलन नहीं है। ब्रिटिश काल से ही स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही मद्यपान निषेध हेतु आन्दोलन समानांतर रुप से चलता रहा था। इस काल में देश के अन्य भागों की भाॅति उत्तराखण्ड में भी शराब के विरोध में आन्दोलन चलते रहे। स्वतंत्रता के पश्चात भी शराब बन्दी के लिये इस क्षेत्र विशेष में व्यापक आन्दोलन हुए। 1965-67 में सर्वोदय कार्यकर्ताओं द्वारा टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा व पिथौरागढ़ तक शराब के विरोध में आन्दोलन चलाया गया परिणाम स्वरुप कई शराब भटिट्टयों को बन्द कर दिया गया।


    1 अपै्रल 1969 को सरकार ने उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ में शराब बंदी लागू कर दी। 1970 में टिहरी व पौड़ी गढ़वाल में भी शराब बंदी लागू कर दी किंतु 14 अप्रैल 1971 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस शराबबन्दी को अवैद्य घोषित कर दिया। सरकार ने आबकारी कानून में परिवर्तन कर शराब के नये लाइसेंस जारी कर दिये। जनता ने तुरन्त विरोध किया। सरला बहन जैसे लोग आगे आये। 20 नवम्बर 1971 को टिहरी में विरोध प्रदर्शन हुआ गिरफ्तारियाँ हुई। अन्ततः सरकार ने झुक कर अप्रैल 1972 से पहाड़ के पांच जिलों में पुनः शराबबंदी लागूकर दी गई। उत्तराखण्ड में शराब विरोधी आन्दोलन लगातार होते रहें हैं। उ.प्र. शासन के इस क्षेत्र की उपेक्षा के परिणामस्वरुप यहाँ न केवल शराब माफिया फले फूले बल्कि पुण्य तीर्थ स्थलों तक मादक द्रव्य पहुॅंच गयें।


    शराब माफिया एक ओर तो उत्तराखण्ड की आय पर प्रहार कर रहे है दूसरी ओर मानव संसाधन को नुकसान पहुंचाकर अर्थव्यवस्था को नष्ट कर रहे हैं। उत्तराखण्ड में नशा विरोधी आन्दोलन "नशा नही रोजगार दो" आन्दोलन के नाम से 2 फरवरी 1984 को अल्मोड़ा जिले के घुगोली, बसभीड़ा ग्राम से चला। शराब की त्रासदी से महिलाए अधिक प्रभावित हुई संभवतः इसी कारण महिलाओं ने मादक द्रव्यों के खिलाफ इस आन्दोलन में बढ़ - चढ़ कर भागीदारी की।


    शराब विरोधी आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी हेतु युवाओं को प्रेरित करने में दशक का समय अवश्य लगा किन्तु एक दशक में पर्वतीय युवा मोर्चा, ग्रामोत्थान छात्र संगठन से लेकर उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के नाम से काम करने वाले युवाओं ने प्रत्येक ग्रामीण अंचल की पदयात्रा कर शराब के दुष्प्रभाव को भली भाॅति समझा। सुरा, शराब, अशोका लिक्विड व तरह-तरह के नशीले, मादक द्रव्यों से उत्तराखण्ड के बाजार व कस्बे भरे थे। ये पदार्थ उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली हाड़ तोड़ परिश्रम करने वाली महिलाओं के लिये एक अभिशाप बन गई जिसके कारण पारिवारिक कलह, अपसंस्कृति व दुर्घटनाओं एवं अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही थीं।


    इसी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए 23-24 अप्रैल 1979 में उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी ने अल्मोड़ा में पेशावर कांड स्मृति नाम से त्रिदिवसीय समारोह रखा गया। इसी सम्मेलन में भावी आन्दोलन की सम्भावनाओं को रेखांकित किया गया। तत्पश्चात अनेक तैयारियों के साथ 2 फरवरी 1984 को में आन्दोलन का श्री गणेश हुआ। आन्दोलन मुखर बनाने के प्रयासों में जनवरी 84 में साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था 'जागर' के दल ने नैनीताल से गढ़वाल तक पदयात्रा की। नारों तथा क्रांतिकारी गीतों द्वारा आन्दोलन को प्रभावी बनाने का हर संभव प्रयास किया गया। परिणामस्वरुप अधिकाधिक संख्या में महिलाओं की भागीदारी आन्दोलन में हुई।


    अपने कार्यकलापों से सक्रिय युवाओं ने आन्दोलन को द्वाराहाट, स्याल्दे, भिकियासैण, ताड़ीखेत, गैरसैण, सल्ट, रामनगर समेत सोमेश्वर आदि क्षेत्रों में तेजी से प्रसारित कर दिया। लम्बे संघर्षो के बाद सरकार ने अल्मोड़ा जिले में आंशिक मद्यनिषेध लागू किया और विरोध के परिणाम स्वरुप शराब बिक्री का काम उत्तर प्रदेश सहकारी चीनी संघ को दे दिया। किंतु मृत संजीवनी सुरा व दवाओं के नाम पर बिकने वाली शराबों के विरुद्ध आन्दोलनकारियों को लम्बा प्रतिरोध करना पड़ा।


    यह आन्दोलन की उपलब्धि गिनी जा सकती है कि इस क्षेत्र से अशोका लिक्विड का खात्मा हुआ साथ ही मृत संजीवनी सुरा के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा 18 अक्टूबर 1986 में फैसला सुनाकर आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर बिकने वाली दवादयों के प्रसार पर कारगर रोक लगाई गई। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आन्दोलन की एक प्रमुख मांग को पूर्ण करते हुए 10 प्रतिशत से अधिक अल्कोहल की दवाओं पर रोक लगाकर 12 प्रतिशत से अधिक अल्कोहल की दवाओं को शराब घोषित किया गया। 'नशा नही रोजगार दो' आन्दोलन में जनसंघर्ष में सामान्य जन की भागीदारी तो सक्रिय रही, दुर्भाग्य रहा कि जनप्रति निधि इस आंदोलन में भागीदार नहीं बनें।


    उत्तराखण्ड में शराब बंदी की लड़ाई परतंत्र भारत से आज तक लड़ी जा रही है; परंतु लोकतंत्रीय सरकारें लोकहित में इस मांग को अनसुनी करती रही है। महिलाओं को शराब त्रासदी की अधिक मार झेलनी पड़ती है अतः युवाओं व महिलाओं को संगठित होकर संघर्ष करना पड़ेगा। शराब बंदी के लिए स्वतंत्रता संग्राम की जैसी लड़ाई लड़कर ही पहाड़ से शराब व शराब माफिया को दूर यहां की सामाजिक, आर्थिक स्थिति को पुनर्जीवित किया जा सकता है।


    उत्तराखण्ड में नशे के विरुद्ध चलाये जा रहे आन्दोलन का मुख्य उद्येश्य जनता के समक्ष इस तथ्य को उजागर करना था कि नशे को माध्यम बनाकर सरकार या व्यवस्थाऐं किस प्रकार उसे विभाजित कर रही हैं। नशे के प्रत्येक पक्ष पर घात-प्रतिघात करने के कारण यह आंदोलन सामाजिक, आर्थिक ही नही, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य तक पहुंचा। इसकी विशेषता इस आंदोलन के नेताओं द्वारा किसी के व्यक्तिगत अधिकार में हस्तक्षेप न करके उस मानसिकता व संस्कृति पर प्रहार करना था जो नशे के दुश्चक्र से पैदा होती है। नशा विरोधी आंदोलन में संस्कृति कर्मियों ने आन्दोलन के दौरान नुक्कड़ नाटक, गीतों आदि के माध्यम से आन्दोलन को अधिकाधिक प्रभावी बनाने में योगदान दिया।


    मादक द्रव्यों द्वारा पोषित अपसंस्कृति किस प्रकार समाज को शनैः - शनैः खोखला कर रही है यह संदेश संस्कृति कर्मियों ने जनता के बीच जाकर पहुंचाया जिससे महिलाएं इस बुराई से जूझने के लिये मुखर हुई तथा अनेक स्थानों पर उन्हें शराबन्दी कराने में आशातीत सफलता प्राप्त हुई। शेखर पाठक "नशा एक षडयंत्र है" जनवरी 1985, पृष्ठ 8 में लिखते हैं कि आयोजन विकास के साथ पहाड़ों में नशे का प्रचलन बढ़ा। यद्यपि 1960 में नशाबंदी की गयी चीन के युद्ध के समय इसे उठा लिया गया। मुख्य कारण आबकारी राजस्व था। सुन्दरलाल बहुगुणा ने सिल्यारा में टिहरी में कच्ची शराब का विरोध किया। सरकार ने घणसाली में भी दुकान खोल दी तो प्रतिक्रिया स्वरुप आंदोलन के स्वर और मुखर हुए। अंततः अप्रैल 1965 को दुकान न खोलने का निर्णय हुआ। शेखर पाठक लिखते है। इस आन्दोलन की सबसे बड़ी कमजोरी इसका सर्वोदय के खोल में रहना था। आंदोलन को किसी और लक्ष्य से नहीं जोड़ा गया था, न आंदोलन की ऊर्जा को भविष्य के लिये संजोया जा सका। लेकिन यह सिर्फ आन्दोलन की ही कमजोरी न थी यह व्यवस्था द्वारा संरक्षित षडयंत्र के तहत हो रहा था।

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