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    गोपाल बाबू गोस्वामी

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    gopalbabugoswami

    गोपाल बाबू गोस्वामी

     जन्म:  फरवरी 2, 1941
     जन्म स्थान: ग्राम - चांदिखेत (अल्मोड़ा)
     पिता:  श्री मोहन गिरी
     माता:  श्रीमती चनुली देवी
     पत्नी  श्रीमती मीरा गोस्वामी
     व्यवसाय:  लेखक, लोकगायक, गीतकार
     मृत्यु  नवंबर 26, 1996


    ‌दुनिया में सभी तरह के लोग होते हैं कुछ नाम कमाते हैं तो कुछ नाम दाम कमाते हैं पर अंत में वही लोग यादों में रहते हैं जो नाम कमाते हैं। कुछ ऐसे ही शक्स थे उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी जिनके काम से उन्हें ही नही पूरे उत्तराखण्ड को भी पहचान मिली। आज हम आपको उनके जीवन से जुड़े कुछ अनछुए पहलूओं के बारे में बताएगें जिनके बारे में बेहद कम ही पढ़ने को मिलता है।


    प्रारंभिक जीवन :


    ‌उत्तराखण्ड के गाँव चांदिखेत, अल्मोड़ा जनपद (2 फ़रवरी, 1941) में जन्में गोपाल बाबू का परिवार बेहद गरीब था। उनके पिता का नाम मोहन गिरी एंव माता का का नाम चनुली देवी था। छोटी सी उम्र से ही उन्हें गानों का शौक था पर यह शौक उनके परिवार वालों को पसंद नही था जिस वजह से उन्हें बार-बार टोका भी जाता रहा। 8वीं उत्तीर्ण कर पाते इससे पहले ही उनके पिता का देहांत हो गया। जिस वजह से परिवार का बोझ उनके कंधों पर आने के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। उसके बाद नौकरी की तलाश ने उन्हें ट्रक ड्राइवर बना दिया। कई बार उन्होंने मेलों में जाकर जादूगरी के तमाशे दिखाने का काम भी किया और साथ ही ग्राहकों को गीत गाकर मनोरंजन भी करते।


    करियर :


    ‌मेलों में गीत गाने से लेकर रेडियो में गीत गाने तक का गोपाल बाबू का सफर काफी रोमांचकारी रहा। एक बार अल्मोड़ा में नन्दादेवी मेले में गीत गाते देख कुमाऊंनी संगीतकार स्वर्गीय ब्रजेन्द्रलाल शाह की नजर उन पर पड़ी। जिसके बाद उन्होने गोपाल बाबू को प्रसिद्ध लोकगायक गिरीश तिवाड़ी गिर्दा के पास भेजा गया। जिन्होने उनके आवाज को तराशा और 1971 में नैनीताल शाखा में काम कर रहे ब्रजेन्द्रलाल साह जी ने गोपाल बाबू जी को अपने साथ काम पर रख लिया, यह एक तरह की सरकारी नौकरी की तरह ही थी।


    ‌गोपाल बाबू ने अपने करियर की शुरूआत "कुमाउँनी गानों" से की। जिसके बाद उनके गानों को लोगों द्धारा बहुत पसंद किया जाने लगा। उनका पहला गीत "कैले बजे मुरूली ओ बैणा" जिसे लखनऊ में रिकाॅर्ड किया गया। इस गीत की लोकप्रियता आकाशवाणी नजीबाबाद व अल्मोड़ा में बढ़ने लगी। जिसके बाद उन्हें बी हाईग्रेट मिल गया।


    पहली कुमाउँनी कैसेट :


    ‌जब उनका पहला गीत हिट हुआ तो उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी जिस वजह से उनके चाहने वालों ने गोपाल बाबू को कैसेट निकालने के लिए कहा। जिसके चलते साल 1976 में उनका पहला कैसेट एच. एम. वी के द्धारा रिलीज किया गया। इसके बाद फैमस पॉलिडोर कैसेट कंपनी के साथ उनके सफर की शुरूआत हुई। उनके कुमाउँनी गीतों की लिस्ट में "हिमाला का ऊँचो डाना प्यारो मेरो गांव", "छोड़ देमेरो हाथा में ब्रह्मचारी छों", "भुर भुरु उज्याव हैगो", "यो पेटा खातिर", "घुगुती न बासा", "आंखी तेरी काई-काई तथा जा चेली जा स्वरास" आदि गीतों को लोगों ने काफी पसंद किया। ये गाने उस दौर में लोगों की जुबांन पर चढ़ गए थे। गोपाल बाबु की ऊँचे पिच पर गाने की खूबी वाकई में काबिले तारीफ थी। इसके अलावा उन्होने काफी डयूएट के रूप में भी काफी गाने गाए। गोपाल बाबु ने नाटक प्रभाग की गायिका श्रीमती चंद्रा बिष्ट के साथ लगभग 15 कैसेटों मेें साथ काम किया।


    पुस्तकें :


    ‌गीतों के अलावा गोपाल बाबू को लेखन का भी शौक था। उन्होनें कुमाउँनी के साथ-साथ हिंदी में भी पूस्तकें लिखी। उनकी प्रमुख पुस्तकें कुछ इस प्रकार से "गीत माला (कुमाउनी)", "दर्पण", "राष्ट्रज्योती (हिंदी)" तथा "उत्तराखण्ड" आदि। इसके अलावा उनकी अन्य पुस्तक उज्याव जो अभी तक प्रकाशित नही हो पायी। उन्होनें जितने भी कुमाउँनी गाने गाए उनमे से ज्यादातर गाने उनके द्धारा लिखे गए थे। मालूशाही तथा हरुहित के भी कैसेट उन्ही ने बनवाए थे।


    मृत्यु :


    ‌गोपाल बाबू ने अपने जीवन के सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे पर कभी भी उनके सामने हार नही मानी और हमेशा ही अपने गीत-संगीत में जुड़े रहे। नौकरी के दौरान उन्हें ब्रेन ट्यूमर हो गया जिस वजह से वे लम्बे समय से बीमारी में रहे। जिसके चलते 26 नवंबर 1996 को इस दुनिया से अलविदा लेना पड़ा। भले ही गोपाल बाबू आज हमारे बीच नही हैं पर उनके गीत सदा के लिए हमारे दिलों में बस गए हैं जिस हम ही नही आने वाली पीढ़ियाॅं भी याद रखेगी।

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