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    गौरा देवी - चिपको वूमन

    ‌गौरा देवी का जन्म 1925 में नंदा देवी अभयारण्य के अन्तिम गाँव लाता, जिला चमोली में हुआ। अन्तर्राष्ट्रीय जगत में 'चिपको वुमन' के नाम से मशहूर है। वन संरक्षण से पर्यावरण की शुद्ध और मानव के अस्वित्व की सुरक्षा के लिए विश्व स्तर पर चलाई जा रही जनचेतना की शुरुआत ‘चिपको’ के माध्यम से करने वाली गौरा देवी उन चन्द गुमनाम सेवियों में से हैं, जिनकी पहल भविष्य में मानव जाति के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।


    प्रराभिक जीवन


    ‌12 वर्ष की आयु में रेणी गाँव के मेहरबान सिंह के साथ गौरा देवी का विवाह हुआ। रेणी गाँव तोलच्छा जाति के भोटियों का गाँव है। गुजर-बसर के लिए पशुपालन, ऊनी कारोबार और थोड़ी सी खेती थी। दुर्भाग्यवश सन्1947 में मात्र 22 वर्ष की आयु में गौरादेवी के पति का देहांत हो गया। तब उनका एक मात्र पुत्र चन्द्र सिंह ढाई वर्ष का था।


    चिपको आंदोलन


    ‌1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के उपरान्त मोटर मार्गों के बिछते जाल ने पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म दिया। 1972 में गौरादेवी ‘महिला मंगल दल’ की अध्यक्ष बनी। 1973 में और उसके बाद गोविन्द सिंह रावत, चण्डी प्रसाद भट्ट, वासवानन्द नौटियाल, हयात सिंह आदि कई छात्र इस क्षेत्र में आए। आसपास के गावों तथा रेणी में सभाए हुई। जनवरी, 1974 में रेणी के जंगल के 2451 पेड़ों की बोली लगने वाली थी। 15 और 24 मार्च, 74 को जोशीमठ में तथा 23 मार्च को गोपेश्वर में रेणी जगंल के कटान के विरुद्ध प्रदर्शन के बावजूद मजदूर जंगल कटान को रेणी गाँव पहुंच गये। वन विभाग के कर्मचारियों के संरक्षण में ठेकेदार के मजदूर ऋषिगंगा के किनारे-किनारे जगंल की ओर बढ़े। महिला मंगल दल की अध्यक्ष गौरा देवी पर आज एक सामुदायिक उत्तरदायित्व के निर्वाह का बोझ आन पड़ा था। घर-परिवार के कार्यों में व्यस्त 21 महिलाएं तथा कुछ बच्चे देखते-देखते जंगन की ओर चल पड़े। इनमें बनी देवी, महादेवी, गौरा देवी, मूसी देवी, नृत्यी देवी, नीलामती, उमा देवी, हरकी देवी, पासा देवी, रूपसा देवी, तिलाड़ी देवी, इन्द्री देवी आदि शामिल थीं। आशंका और आत्मविश्वास के साथ वे आगे बढ़ती चली गई। इन सबने खाना बना रहे महदूरों से कहा- ‘भाइयो यह जंगल हमारा आपका है; इससे हमें जड़ी-बूटी, सब्जी, फल, लकड़ी मिलती है। जंगल काटोगे तो बाढ़ आएगी, हमारे बगड़ बह जायेंगे। खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो; जब हमारे मर्द आ जाएंगे, तो फैसला होगा।


    ‌ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें धमकाने लगे। काम में बाधा डालने पर गिरफ्तारी की धमकी दी। महिलाएं डरी नही; कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। मगर उन सबके भीतर छिपा रौद्र रूप तब गौरा देवी के मार्फत प्रकट हुआ, जब एक ने बंदूक निकालकर उनकी ओर तानी। आगे बढ़ कर, गरजते हुए उन्होंने कहा- ‘मारो गोली और काट लो हमारा मायका’। ऐसा जवाब सुनकर मजदूरों में भगदड़ मच गई। ठेकेदार के आदमियों ने पुनः गौरा देवी को डराने-धमकाने का प्रयास किया। यहां तक कि उनके मुंह पर थूक दिया, किन्तु गौरा देवी ने संयम नहीं खोया। मायका बच गया; प्रतिरोध की सौम्यता और गरिमा बनी रही। 27 और 31 मार्च को फिर रेणी गाँव में सभा हुई और बारी-बारी से वन की निगरानी शुरू हुई। रेणी के जंगल के साथ-साथ अलकनन्दा में बाई ओर से मिलनेवाली समस्त नदियों-ऋषिगंगा, पातालगंगा, गरुड़गंगा, विरही और मन्दाकिनी के जल ग्रहण क्षेत्रों तथा कुंवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा की बात उभरकर सामने आई और सरकार को इस हेतु निर्णय लेने पड़े। सीमांत का खामोश गाँव रेणी दुनिया का एक चर्चित गांव हो गया। गौरा देवी चिपको की प्रतीक बन गई।


    मृत्यु


    ‌4 जुलाई , 1991 को लम्बी बीमारी के बाद चिपको वुमन नाम से प्रसिद्द गौरा देवी जी का निधन हो गया।


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