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    भैरव दत्‍त धूलिया

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    18 मई 1901 को गढ़वाल जिले के मदनपुर गाँव में श्रीमती सावित्री देवी तथा श्री हरिदत्त धूलिया के घर जन्म लेने वाले भैरवदत्त ने मदनपुर तथा दोगड्डा के बाद बनारस में शिक्षा पाई थी। वे सामान्य तौर पर संस्‍कृत साहित्य के और विशेष रूप से ज्योतिष के छात्र रहे। 14 साल की उम्र में उनका श्रीमती छवाणी देवी से विवाह हो गया था। बनारस में उन्होंने न सिर्फ अपने को एक बड़ी दुनिया में पाया बल्कि अपने लिए संस्कृत और ज्योतिण पढ़ने तथा देश के लिए संग्राम में शामिल होने में से किसी एक को चुनने का मौका भी उन्हें बनारस ने ही दिया। यह आश्चर्यजनक है कि धूलिया ने दोनों कार्य किये। बनारस ने नेपाल की तरह उत्तराखण्ड के भी अनेक संग्रामियों शरण को और शक्ति दी थी।


    1921 में बेगार आन्दोलन के समय से एक छात्र आन्दोलनकारी के रूप में अपने मित्रों के साथ गढ़वाल लौटे और फिर एक संग्रामी के रूप में ही पहाड़ से नीचे उतरे । इसके बाद वे राष्ट्रीय संग्राम की हर अभिव्यक्ति में शामिल होते रहे और 1942 में गिरफ्तारी तथा जेल यात्रा भी सम्पन्न हुई। 1921 से 30 का दशक भी बनारस में ही बीता। बीच में वे हरिद्वार के ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज से आयुर्वेदिक शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके थे। बनारस से हाईस्कूल तथा इण्टर करके फार्मेस्यूटिकल कैमिस्ट्री लेकर उन्होंने बी.एस-सी. में प्रवेश लिया। अंग्रेजी अलग से सीखनी शुरू की। बनारस में ही उनके लाज में डॉ. राममनोहर लोहिया आये और रहे थे। 1935-36 में धूलिया जी काशी विद्यापीठ के कुमार विद्यालय में अध्यापक भी रहे।


    1937 के बाद वे गढ़वाल लौटे और प्रारम्भ से ही कर्मभूमि के प्रकाशन-सम्पादन से जुड़ गये। राष्ट्रीय संग्राम के समय भक्तदर्शन ही कर्मभूमि की प्रथम पहचान और प्रतिभा थे और फिर भैरवदत्त धूलिया, श्रीदेव सुमन, ललिता प्रसाद नैथानी आदि उनके सहयोगी बने थे। आजादी के बाद भैरवदत्त धूलिया इसकी प्रथम पहचान बन गये। ये सभी संग्रामी पत्रकार की हैसियत प्राप्त करते गये। कर्मभूमि 1942 से 45 के बीच ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के कारण बन्द रही। वे स्वयं जेल में थे। 1949 में टिहरी रियासत के उत्तर प्रदेश में विलय तक कर्मभूमि ने ब्रिटिश गढ़वाल तथा टिहरी रियासत में जागृति लाने तथा राष्ट्रीय संग्राम की लहर विकसित करने में असाधारण योगदान दिया।


    19 फरवरी को बसन्त पंचमी के दिन गढ़वाल के कतिपय शिक्षित और जागरूक जनों द्वारा 1939 'हिमालय पब्लिशिंग एण्ड ट्रेडिंग कम्पनी' के तत्वावधान में 'कर्मभूमि' साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। उस कम्पनी के प्रमुख संचालक थे- सर्वश्री भक्त दर्शन,कुंवर सिंह नेगी 'कर्मठ', योगेश्वर प्रसाद बहुगुणा, प्रयाग दत्त धस्माणा, हरेन्द्र सिंह रावत और नन्दा दत्त घिल्डियाल कुछ समय बाद ललिता प्रसाद नैथाणी और जगमोहन सिंह नेगी को कम्पनी के संचालक मंडल में ले लिया गया। भक्त दर्शन जी को पच्चीस रुपया मासिक वेतन पर 'कर्मभूमि' का सम्पादक बनाया गया । थोड़े से अन्तराल क बाद भक्त जी ने धूलिया जी को बुलाया और पच्चीस रुपया मासिक वेतन पर उन्हें कर्मभूमि क सम्पादन का दायित्व सौंपा। धूलिया जी में देशभक्ति का जजबा तो अध्ययन काल से था ही, कर्मभूमि के माध्यम से उन्हें अपने राष्ट्रवादी विचारों को व्यक्त करने का अवसर मिल गया। अपनी विद्वता, प्रतिभा के बल पर कर्मभूमि के माध्यम से धूलिया जी ने गढ़वाल भर में राष्ट्रीय विचारों का शंखनाद फूंक दिया।


    1940 में इनकी जीवन संगिनी का निधन हो गया। तब से जीवन के अंतिम क्षण तक धूलिया जी ने एक तपस्वी ब्रह्मचारी साधक का जीवन जीया। 1942 के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो' आन्दोलन में धूलिया जी की अग्रणी भूमिका रही। इसी दौर में उन्होंने अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से निकाल दो पुस्तिका लिखी। यह पुस्तक योगेश्वर प्रसाद धूलिया के प्रयासों से बम्बई से 'हनुमान चालीसा' छद्म नाम से गढ़वाल भर में वितरित की गई । इस पुस्तक ने सारे पर्वतीय प्रदेश में क्रान्ति की ज्वाला धधका दी। 10 नवम्बर 1942 को सहायक जिलाधीश ए.डी. पन्त की अदालत में विद्रोह करने के आरोप में धूलिया जी को 3 वर्ष और बागियों को शरण देने के अपराध में 4 वर्ष (कुल 7 वर्ष) कारावास की सजा सुनाई गई। गढ़वाल क्षेत्र में आन्दोलनकारियों को दी गई सजाओं में यह सर्वाधिक लम्बी अवधि की सजा थी। 1946 में जेल से मुक्त होने के बाद उन्होंने पुनः कर्मभूमि की बागडोर सम्भाली। निस्वार्थ भाव और निर्भीकता के साथ उन्होंने जनता की सेवा की। डोला—पालकी आन्दोलन, अस्पृश्यता आन्दोलन, शराब बन्दी और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उन्होंने जेहाद छेड़ दिया था। धूलिया जी जीवन भर सिद्धान्तप्रिय व्यक्ति रहे। मन, कर्म से विशुद्ध गांधीवादी थे। कांग्रेस के आचरण और व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने वचन 1949 में सदैव के लिए कांग्रेस से नाता तोड़ दिया था।


    1962 में धूलिया जी ने उ.प्र. विधान सभा का किन्तु रह गए। पुनः1967 चुनाव लड़ा और कांग्रेस के तत्कालीन दिग्गज लीडर मंत्री जगमोहन सिंह नेगी को ऐतिहासिक पराजय देकर विधान सभा में पहुंचे। इस हार से नेगी जी को इतना गहरा सदमा पहुंचा कि उन्होंने बिस्तर पर लिया और फिर कभी नहीं उठे। तत्कालीन संविद सरकार की जनविरोधी नीतियों से खिन्न होकर उन्होंने 18 दिसम्बर 1967 को विधान सभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। 1985 में इनके ज्येष्ठ पुत्र उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री केशव चन्द्र धूलिया के असामयिक निधन से वे अन्तर्मन से टूट गए थे। एक विरक्त महामानव की तरह इस आघात को धैर्यपूर्वक झेलते गए। गढ़वाल की पत्रकारिता के पुरोधा एक संघर्षशील व्यक्तित्व, निर्भक, निराभिमानी, निश्छल, गांधीवाद के सम्वाहक धूलिया जी स्मृतियों को छोड़ कर, सत्तासी वर्ष की जीवन यात्रा तय कर बह्मलीन हुए।


    1956 में उन्होंने कर्मभूमि का स्वतंत्रता संग्राम विषयक एक विशेष अंक भी निकाला था। उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे शरद धूलिया तथा पीताम्बर देवरानी आदि ने कर्मभूमि को जारी रखने का प्रयास किया लेकिन अन्तत यह पत्र बन्द हो गया।

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