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    बाँज - उत्तराखंड का सोना

    उत्तराखण्ड में कई प्रकार के पेड़ पाये जाते हैं, जैसे चीड़, देवदार, भोजपत्र, भीमल, खड़िक, पईयाँ, मेहल, च्यूरा, साल, शीशम, बाँज इत्यादि। ये सभी अत्यन्त उपयोगी हैं लेकिन इन सब में सबसे अधिक उपयोग में आने वाला पेड़ है बाँज। यह अपने विस्तृत वितरण, बहुमुखी उपयोग एवं ग्रामीण क्षेत्रों की गतिविधियों से जुड़ा रहने के कारण अन्य पेड़ों की तुलना में ईंधन व चारा जैसे आवश्यक साधन उपलब्ध कराने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बाँज की यद्यपि उत्तराखण्ड में कुल मिलाकार पाँच प्रजातियाँ हैं, प्रस्तुत वर्णन में बाँज शब्द का प्रयोग बाँज की सभी प्रजातियों के सन्दर्भ में किया गया है। इस पेड़ की प्रमुख विशेषता यह है कि यह सदाबहार है। वर्ष भर हरा-भरा रहने के कारण चारे की दृष्टि से यह वृक्ष विशेष उपयोगी है। केवल इतना ही नहीं, बाँज का पेड़ अन्य दृष्टियों से भी अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हुआ है। पर्वतीय क्षेत्र की भूमि में नमी रखने, जल संसाधनों की पूर्ति करने, मिट्टी के कटाव को रोकने एवं उसकी खनिजों से गुणवत्ता बढ़ाने में बाँज के पेड़ का उल्लेखनीय योगदान है। बाँज के वृक्ष में कई गुण पाये जाते हैं। जहाँ एक ओर यह पर्यावरण एवं विविध प्राकृतिक क्रियाओं के मध्य संतुलन बनाये रखने में सहायक है दूसरी ओर यह मनुष्य की आर्थिक एवं दैनिक जीवन यापन सम्बन्धी क्रियाओं से भी बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। शीत प्रधान क्षेत्रों में पाये जाने व धीमी गति से बढ़ने के कारण यह वृक्ष अधिक घनत्व वाला व कठोर होता है तथा इसकी जड़ें लम्बी व फैली हुई होती हैं। साथ ही इसमें विषम जलवायु दशाओं में उगने की भी क्षमता होती है। बाँज के पेड़ों की लम्बी तथा फैली हुई जड़ें, पानी के वेग को कम करती हैं, जिससे भूमि के कटाव को रोकने तथा भूमि की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने में एवं पानी को इकठ्ठा करने में बहुत अधिक सहायता मिलती है। बाँज के वन जहाँ मनुष्य के लिए एक स्वास्थ्य-वर्धक वातावरण उपलब्ध कराते हैं, वहीं उच्च भागों में जल को अपनी जड़ों के समूह में अवशोषित व भूमिगत कर, यह वर्ष भर सदानीरा, जीवन दायिनी नदियों एवं अन्य जल धाराओं व जल श्रोतों जैसे नौले, धारे आदि का सतत प्रवाह बनाये रखने में भी सहायक हैं। बाँज के वन वास्तव में एक बहुमूल्य प्राकृतिक वरदान हैं। खेती, भूमि की उपजाऊ शक्ति को कम करती है और बाँज के वन इस कमी को प्राकृतिक रूप से पुनः पूरा कर देते हैं क्योंकि इसकी पत्तियों में उपजाऊ शक्ति बढ़ाने वाले कई आवश्यक तत्व होते हैं।


    बाँज की पत्तियों का वनस्पति विकास में भी पर्याप्त योगदान होता है। बाँज का पेड़ स्वयं हर तरह से उपयोगी तो है ही, साथ ही साथ यह अन्य कई प्रकार की विशिष्ट वनस्पति प्रजातियों को फलने-फलने के लिए उचित वातावरण भी प्रदान करता है, जिसका सबसे अच्छा उदाहरण बरसात के दिनों में देखा जा सकता है जब बाँज के तने एवं शाखाओं को अनेक प्रकार की वनस्पति की प्रजातियाँ ढक लेती हैं जैसे औरकिड, मौस, फर्न, लाइकन इत्यादि इत्यादि।


    उत्तराखण्ड में पाये जाने वाले बाँज की प्रजातियाँ


    उत्तराखण्ड में बांज के वनों का विस्तार विभिन्न ऊँचाइयों पर मुख्य रूप से नम तथा उत्तरी ढलानों में पाया जाता है। सामान्यतः ये वन समुद्र तल से 1200 मीटर (4000 फीट) की ऊँचाई से लेकर 2500 मीटर (8300 फीट) के मध्य पाये जाते हैं। इस वृक्ष की विभिन्न प्रजातियों में तिलोंज बाँज एवं खरसू बांज अत्यधिक ऊँचाई में पाये जाते हैं जबकि रियांज बाँज मध्यवर्ती ऊँचाइयों में उगता है। फलियाँट प्रजाति, जो बाँज की भांति ही निचले एवं बसासत वाले क्षेत्रों की विशेषता है, बाँज के समान विस्तृत रूप से नहीं पाई जाती। स्वाभाविक रूप से सभी प्रजातियों में बाँज ही सबसे अधिक जानी भी जाती है और पाई भी जाती है। विशेष बात यह है कि मानव कुप्रभावों का यही अत्यधिक शिकार भी हुई है। इन कारणों से ही इसके संरक्षण की भी सबसे अधिक आवश्यकता है क्योंकि एक तो इसका वितरण पर्वतों में जनसंख्या के वितरण के ही अनुरूप है, दूसरा इसके बीजों को, कई प्रकार के जंगली पशु पक्षियों द्वारा खाया एवं नष्ट किया जाता है तथा साथ ही इसके बीजों को नानाप्रकार के कीट एवं फफुद से शीघ्र हानि होने की सम्भावना भी रहती है। ऐसी दशायें बांज की अन्य प्रजातियों में कम पाई जाती हैं।


    (1) फलियाँट, फनियांट, हरिन्ज बाँज


    बाँज की यह प्रजाति उत्तराखण्ड में 900 मीटर (3000 फीट) से 2000 मीटर (6600 फीट) की ऊँचाई के बीच में मिलती है। इसकी विशेषता यह है कि यह पानी के नजदीक या नदी नालों के पास विशेष रूप से उगती है। इस पेड़ का उपयोग कई प्रकार से किया जाता है, जैसे चारा, ईंधन, कृषि यंत्रों आदि के लिये। यह प्रजाति कुमाऊं एवं गढ़वाल क्षेत्र में विशेषकर छायादार व नम गधेरों के समीप पायी जाती है। यह वृक्ष उपरोक्त स्थानों में छोटे-छोटे समूहों में पाये जाते हैं तथा इनके विशाल एवं विस्तृत जंगल नहीं मिलते हैं।


    (2) बाँज


    अन्य की तुलना में यह प्रजाति सबसे विस्तृत एवं उल्लेखनीय है तथा उत्तराखण्ड में 1200 मीटर (4000 फीट) की ऊँचाई से लेकर 2500 मीटर (8300 फीट) तक पायी जाती है। कहीं-कहीं अत्यन्त सीमित स्थानों पर उपयुक्त वातावरण मिलने के कारण बाँज के वृक्ष चीड़ व साल के वनों के साथ-साथ 450 मीटर तक (1500 फीट) के निचले क्षेत्रों में भी देखने को मिलते हैं। यह एक बहुत उपयोगी प्रजाति सिद्ध हुई है क्योंकि इसकी लकड़ी का उपयोग खेती-बाड़ी के काम में आने वाले औजारों को बनाने तथा ईंधन के लिये सबसे अधिक मात्रा में किया जाता रहा है। बाँज की लकड़ी से बने औजार व औजारों के भाग अधिक टिकाऊ होते हैं तथा ईंधन के रूप में भी यह लकड़ी आसानी से उपलब्ध एवं सरलता से जलने वाली और अधिक ऊर्जा उपलब्ध कराने वाली सिद्ध हुई है। इसके साथ-साथ बाँज की पत्तियाँ इस क्षेत्र के पशुओं की विशाल संख्या को चारा प्रदान कराने की दृष्टि से आज भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं एवं भविष्य में भी बहुत महत्वपर्ण रहेंगी।


    (3) रियाँज, साँज बाँज


    यह प्रजाति उत्तराखण्ड में 1800 मीटर (6000 फीट) की ऊँचाई से लेकर 2450 मीटर (8100 फीट) की ऊँचाई के मध्य पाई जाती है। भौगोलिक वितरण की दृष्टि से रियाँज कुमायूँ के लगभग सभी जिलो में अधिक मात्रा में पाया जाता है जबकि गढ़वाल में इसका वितरण अत्यन्त सीमित रूप में है। रियाँज के पेड़ बांज के पेड़ों के साथ-साथ उगते हैं। कभी-कभी यह प्रजाति बांज रहित भागों में भी पायी जाती है। इस पेड़ का उपयोग भी बांज की तरह कई प्रकार से किया जाता है। रियाँज बाँज अधिकांशतः चूनायुक्त मिट्टी के क्षेत्रों में ही उगता है और इस कारण इसका वितरण अत्यन्त बिखरा हुआ है।


    (4) तिलन्ज, मोरू, तिलोंज बाँज


    यह प्रजाति उत्तराखण्ड के उच्च पर्वतीय भागों में लगभग 1800 मीटर (6000 फीट) की ऊँचाई से लेकर 3000 मीटर (10000 फीट) की ऊँचाई के बीच पाई जाती है। तिलोंज बांज की प्रजाति का वृक्ष गहरी मिट्टी, नम उत्तरी ढालों एवं चूनायुक्त क्षेत्रों में घने वनों के रूप में पाया जाता है। इसकी लकड़ी अत्यधिक टिकाऊ होती है। ईंधन के रूप में यह अन्य बांजों के मुकाबले बहुत अधिक ताप शक्ति वाली होती है। तिलंज बांज के पेड़ अधिक मोटाई वाले व घने होते हैं। ये वन उच्च पर्वतीय भागों में ही पाये जाते हैं जहां सीमित मानव अधिवास मिलते हैं। कम जनसंख्या के कारण तथा सीमित मानव गतिविधियों के कारण यद्यपि इन वनों का इतना ह्रास नहीं हुआ है जितना मानव आबादी के समीप होने के कारण बाँज के वनों का, परन्तु तिलोंज के वनों में भी बड़े पैमाने पर स्थानीय एवं स्थानान्तरित होने वाले पशुओं के लिये चारे की निर्भरता बनी रहती है और इस कारण इन वनों में भी धीरे-धीरे कमी आती जा रही है। एक विशेष प्रकार का कीट तिलोंज की पत्तियों में तरह-तरह की छोटी-बड़ी गाँठ बनाता है, जो खाने एवं स्वाद में मीठा होता है। इसका उपयोग कुछ भागों में फलों की तरह खाने के लिये भी किया जाता है-विशेषकर पश्चिमी गढ़वाल के जौंसार बाबर क्षेत्र में।


    (5) बरस या खरू बाँज


    उत्तराखण्ड में खरस बाँज सबसे अधिक ऊँचाई वाले भागों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह प्रजाति 2100 मीटर (7000 फीट) की ऊँचाई से लेकर 3500 मीटर (11600 फीट) के बीच पायी जाती है। खरसू वनों की सबसे प्रमुख विशेषता इनका विस्तृत वितरण एवं अत्यधिक घने रूप में पाया जाना है। स्थानीय निवासियों के मौसमी स्थानान्तरण एवं पशुचारक क्रियाओं के कारण इन उच्च भागों में भी बाँज की इस प्रजाति का उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता रहा है जैसे-चारा, कच्ची झोपड़ियों के लिये लकड़ी तथा ईधन आदि में।

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