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    शक्ति (1918)

    shakti

    ‌शक्ति प्रारम्भ से ही आक्रामक, प्रखर राष्ट्रवादी और स्पष्टवादी पत्र रहा। उसने राष्ट्रीय आन्दोलन के अन्तिम तीन दशकों में स्थानीय जनता को जागृत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया, साथ ही आन्दोलन में स्थानीय सेनानियों का अस्त्र भी बना। उसने स्थानीय कुली बेगार तथा जंगलात के आन्दोलनों को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने हेतु असहयोग आन्दोलन की नीति का प्रयोग किया। बेगार के सबंध में आक्रामक लेखन के कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा शक्ति पर 6000/-रू. की मानहानि का दावा किया गया तथा इसके कई सम्पादकों को त्याग पत्र देने पे मजबूर किया गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान शक्ति स्थानीय स्तर पर राष्ट्रीय आन्दोलन का सर्वाधिक प्रचारक और प्रमुख अस्त्र बन गया था। इस दौरान कुमाऊँ में 'लिखेंगे तख्ती पढ़ेंगे शक्ति' नारा प्रचलित था। 1930 में इससे हजार रूपए जमानत मांगी गयी, जिस कारण यह चार माह तक प्रकाशित नहीं हो सका। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान सम्भावित खतरा समझ ब्रिटिश सरकार ने अगस्त,1942 में शक्ति के कार्यालय में छापा मारा तथा सम्पादक को गिरफ्तार कर लिया। जनवरी, 1946 तक लगभग तीन वर्ष पांच माह शक्ति प्रकाशित नहीं हो सका।


    ‌शक्ति यद्यपि मूलतः राष्ट्रवादी कांग्रेसी पत्र बना रहा, तथापि वामपन्थ, समाजवाद आदि से सम्बन्धित समाचार भी प्रकाशित करता रहा। कुली बेगार तथा जंगलात के अतिरिक्त शिक्षा के विकास, अछूतोद्धार, नायकोद्धार, महिला जागृति तथा धर्मनिरपेक्षता पर भी शक्ति ने सम्पादकीय प्रकाशित किये। स्थानीय आर्थिक समस्याओं और साहित्य को भी शक्ति में पर्याप्त स्थान दिया गया। अपने समकालीन अन्य पत्रों की अपेक्षा शक्ति अधिक प्रभावशाली पत्र रहा क्योंकि जितने स्थानीय नेता इससे जुड़े थे, उतने किसी अन्य पत्र से नहीं।

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