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    सतपाल महाराज

    श्री सतपाल महाराज (श्री सतपाल जी महाराज) एक आध्यात्मिक गुरु, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ है। वह भारतीय जनता पार्टी के सदस्य है और वर्तमान में पौड़ी गढ़वाल ज़िले की चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र से विधायक है। वह उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री है। बतौर मंत्री उनके पास पर्यटन, सांस्कृतिक मामले एवं सिंचाई जैसे अहम पोर्टफोलियो (विभाग) है। अपनी राजनितिक ज़िम्मेदारी से इतर वह मानव उत्थान सेवा समिति नामक अध्याम्तिक-सामाजिक संगठन के प्रमुख भी जो कि मानव कल्याण के लिए विश्व भर में प्रख्यात है। वह उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के मूल निवासी है।


    व्यक्तिगत जीवन


    सतपाल महाराज का जन्म 21 सितम्बर 1951 को हुआ था। उनका जन्मस्थान कनखल, हरिद्वार है। उनके पिता का नाम श्री हंस राज जी महाराज था जो कि प्रसिद्द आध्यात्मिक गुरु थे और उनकी माता का नाम राजेश्वरी देवी था। बचपन से ही, उनकी आध्यात्मिकता में गहरी रूचि थी और अक्सर गहरी ध्यान तकनीकों का अभ्यास करने के लिए वे घोर चिंतन की अवस्था में चले जाते थे।


    घर पर आध्यात्मिक प्रेरण और प्रशिक्षण के बावजूद, उन्हें औपचारिक स्कूली शिक्षा के लिए सेंट जॉर्ज कॉलेज, मसूरी भेजा गया ताकि वे विभिन्न भाषाओं और विज्ञानों को सीख सकें। उन्होंने दार्शनिक बहस और व्यावहारिक विज्ञान के लिए अपनी रुचि प्रकट की और उसी के लिए पुरस्कार जीते।


    8 फरवरी 1981 में उन्होंने विवाह कर लिया। उनकी धर्मपत्नी का नाम अमृता रावत है। उनके कुल २ पुत्र हैं। उनके पुत्रों का नाम क्रमश: सुयश महाराज एवं श्रद्धेय महाराज है।


    आध्यात्मिक जीवन


    उनके पिता हंस राज जी, जो एक जाने-माने आध्यात्मिक गुरु थे, ज्ञान की उपदेशित तकनीकों का अभ्यास करते थे और आध्यात्मिक प्रवचनों को बड़े-बड़े अनुयायियों तक पहुँचाते थे, उनके जीवन पथ पर प्रकाश डालते थे और उन्होंने उन्हें वही सिखाया जिसका असर सतपाल जी पर काफी गहराई तक हुआ।


    वह हमेशा स्वभाव से प्रयोगात्मक रहे और जब तक वह व्यक्तिगत अनुभव या उद्देश्य विश्लेषण के माध्यम से इसे सत्यापित नहीं करते थे तब तक वह किसी चीज को स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने प्रयोग करने के लिए अपने घर में अपनी प्रयोगशाला स्थापित की थी। अपने लड़कपन में, उन्होंने कभी-कभी एक "शांति-बम" का आविष्कार करने के विचार पर काम किया जो अन्य सभी परमाणु बमों का मुकाबला कर सकता था और इस तरह दुनिया को कुल विनाश से बचा सकता था।


    1966 में उनके पिता का निधन हो गया, जिससे उन्हें दुनिया के सामने आध्यात्मिक ज्ञान का संचार करने का काम मिला और इस तरह 1970 में उन्होंने आधिकारिक तौर पर अपने पिता की विरासत संभाली। हालांकि पहले वह सुर्खियों में नहीं थे लेकिन समय एक साथ उन्होंने अपने अनुयायियों को उपदेश देना शुरू कर दिया। उन्होंने हमेशा सबको एक ही सन्देश दिया है कि ईश्वर केवल एक है और वही हमारा पिता है।


    अपने जीवन के शुरुआती समय से, सतपाल महाराज समाज की बेहतरी के लिए सुधार लाने वाले एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं। उन्होंने कई गैर-लाभकारी क्लीनिक खोले, धर्मशाला एवं शेल्टर होम खोलें और दूरदराज के लोगों के पास अन्य महत्वपूर्ण सेवाएं पहुंचे जिनकी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सरकारी योजनाओं तक पहुंच नहीं है। अपनी किशोरावस्था तक, वह तत्कालीन उत्तर प्रदेश के पहाड़ी दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों की समस्याओं से परिचित हो गए और और उत्तराखंड के अलग राज्य की अपनी माँग के साथ खड़े हुए।


    सामाजिक कार्य जीवन


    उन्होंने सामाजिक कारणों से बड़े पैमाने पर समर्थन के साथ कई पदयात्राएं करी। इसके अलावा, वह मनुष्य की सीमित चेतना को आदिकालीन, ब्रह्मांडीय कंपन के साथ एकजुट करके प्रकट करना चाहते थे। इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए सन 1975 में उन्होंने एक सामाजिक-आध्यात्मिक सोसाइटी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य मनुष्य को अज्ञानता और अंधविश्वास के उत्पीड़न से बचाना था। इस सोसाइटी को "मानव उत्थान सेवा समिति" कहा जाता है, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है। सतपाल महाराज जी एक प्रसिद्ध सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में लोगों के बीच गहराई से पहचाने जाते हैं।


    मानव उत्थान सेवा समिति के विद्यालय और आश्रम पूरे विश्व भर में फैले हुए है जहाँ युवाओं को औपचारिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती है। यह संस्था समाज के निचले वर्ग के लिए भोजन, शिक्षा आदि सुविधाओं का काम करती है। आज इस संस्था से करोड़ो लोग बतौर स्वयंसेवक जुड़े हुए है। इस संस्था का कार्य मन्त्र है सर्व सदभाव सेवा है।


    राजनीतिक जीवन


    90 के दशक में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होकर अपनी राजनीतिक जीवन की शुरुआत करी। 1991 में उन्हें उत्तर प्रदेश की प्रदेश कांग्रेस समिति का सदस्य बनाया गया। अगले वर्ष 1992 में उन्हें राष्ट्रीय राहत एवं सद्धभावना समिति का सदस्य चुना गया जब देश में साम्प्रदयिक माहौल खराब चल रहा था। समुदायों में शान्ति लाने के लिए उन्होंने ठोस पहल करी और इसी के चलते उन्हें ऑल इंडिया कांग्रेस समिति का सदस्य चुना गया और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में कदम रखा। वह दो साल तक इस समिति के अध्यक्ष रहे।


    मार्च 1993 से अक्टूबर 1994 तक उत्तर प्रदेश राज्य एकीकरण परिषद् के सदस्य बने। 1994 में उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के तहत बनी उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष परिषद् के प्रमुख सदस्य (पैट्रन) के तौर पर भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई और एक अग्रणी नेता के तौर पर खुद को स्थापित किया।


    1995 में एन डी तिवारी की खेमे वाली इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) के वह राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे। अगले साल वह इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुने गए। 1996 में वह पहली बार पौड़ी संसद क्षेत्र से लोकसभा सांसद बने।


    सतपाल महाराज ने उत्तराखंड के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक सांसद और केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने उत्तराखंड के अलग राज्य के निर्माण के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु से समर्थन हासिल किया था।


    जब केंद्र सरकार 1996 में उत्तराखंड को केंद्रशासित राज्य का दर्जा देने पर विचार कर रहा था, तो उन्होंने पीएम एचडी देवेगौड़ा को आश्वस्त किया था कि उत्तराखंड के अलग राज्य की मांग के लिए अगर केंद्र शाषित रजया का दर्जा दिया जाता है फिर भी पूर्ण स्वतंत्र राज्य की मांग उठती रहेगी।


    यह उनके प्रयासों के कारण ही था कि पीएम देवेगौड़ा ने उत्तराखंड को राज्य का दर्जा देने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और 15 अगस्त 1996 को लाल किले की प्राचीर से इस संबंध में एक घोषणा की। 1996 से 1997 तक संयुक्त मोर्चा सरकार में वह देश के केंद्रीय रेलवे मंत्री रहे। 1997 से 1998 में उन्होंने वित्त राज्य मंत्री का पदभार संभाला था।


    2000 में उत्तराखंड राज्य की स्थापना के साथ ही वह राज्य की राजनीति में वापिस शामिल हो गए। वह उत्तराखंड राज्य से ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के सदस्य चुने गए। साल 2001 में उत्तरखंड कांग्रेस के ह्यूमन राइट्स प्रकोष्ट के अध्यक्ष बनाये गए।


    साल 2002 से 2004 तक वह कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय सचिव चुने गए। साल 2003 से 2007 में उत्तराखंड राज्य की स्थापना के उपरान्त बने 20 सूत्रीय कार्यक्रम के इम्प्लीमेंशन के लिए बनी समिति के वह वाइस-चेयरमैन बने और राज्य के हितो की पूर्ति सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई।


    साल 2008 में उन्होंने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी का इकाई का प्रभारी नियुक्त किया गया। साल 2009 में वह दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए और डिफेन्स स्टैंडिंग कमिटी के चेयरमैन का पद संभाला। इसके अलावा वह पब्लिक एकाउंट्स कमिटी और जनरल पर्पस कमिटी के सदस्य भी रहे।


    वर्ष 2011 में उन्होंने यूनाइटेड नेशंस महासभा को सम्बोधित किया था और स्पोर्ट्स फॉर पीस एंड डेवलपमेंट विषय पर भाषण दिया था। केंद्रीय आलाकमान से नाराज़गी के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और 2014 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए।


    उन्होंने 2017 में पौड़ी गढ़वाल ज़िले के चौबट्टाखल विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और पहली बार विधायक चुने गए। बतौर मंत्री उनके पास पर्यटन, सांस्कृतिक मामले एवं सिंचाई जैसे अहम पोर्टफोलियो (विभाग) है।


    सतपाल महाराज उत्तरखंड के सबसे प्रसिद्द नेताओं में एक रहे है। वह शांत, संवेदनशील, कर्मठ एवं दार्शनिक व्यक्तित्व के माने जाते है। उत्तराखंड राज्य एवं देश की राजनीति में उन्होंने खुद को स्थापित किया है फिर वह चाहे बतौर राजनेता हो या फिर आध्यात्मिक गुरु के तौर पर, उनकी उपलब्धियों की उपस्तिथि अंतरार्ष्ट्रीय एवं राष्टीय स्तर पर दर्ज़ है।

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