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    कुमाऊंनी मुकुट

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    कुमाउँनी मुकुट पहने हुए वर-वधु


    भारत मान्यताओं और संस्कृति की अनूठी परम्पराओं का देश रहा है। इन्ही संस्कृति में शादियों में दूल्हा और दुल्हन के मुकुट पहनने की परम्परा लगभग पूरे भारत वर्ष में पायी जाती है, बस संस्कृति के अनुसार मुकुट बदल जाते है। कुमाऊंनी मुकुट की खासियत इसका आकार, सजावट व गणेश और राधा-कृष्ण के चित्र हैं। कुमाउँनी विवाह में वर-वधु के मस्तक पर मुकुट बांधने की बहुत पुरानी परम्परा है। मुकुट बनाना एक प्रकार की हस्तशिल्प कला है। हाथो द्वारा ही मुकुट को आकार तथा सजाया जाता है पिछले कुछ दशक तक कुमाउँनी मुकुट बांस के सीक से बनाये जाते थे। सीक के दोनों तरफ सादा पेपर चिपका कर हल्का सा गोल घुमा कर इसके किनारे पर कागज के रंगीन फूल बनाये जाते थे। बीच में राधा-कृष्ण और गणेश के चित्र, मुकुट के ऊपर दो तोते के चित्र होते थे। वर के मुकुट पर श्री गणेश का चित्र शुभ फलदायक और वधू के मुकुट पर राधा कृष्ण का चित्र अटूट प्रेम का प्रतीक होता है।


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    प्राचीन वर मुकुट

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    प्राचीन वधु मुकुट


    बदलते दौर के साथ मुकुट और इसके पहनने के तरीके में काफी बदलाव आया है, अब मुकुट गत्ते से बनाए जाते हैं। राधा-कृष्ण और गणेश के चित्र भी दिल्ली से छप के आने लगे हैं। मुकुट पर बनने वाले फूल और तोते की जगह लेस ने ले ली है। मुकुट का साइज भी मांग के अनुसार छोटा हो गया है।


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    नवीन वर मुकुट

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    नवीन वधु मुकुट


    यह मान्यता भी है कि वर बारात के घर वापिस लौटने के बाद मुकुटों को पूजा पाठ के बाद पानी के स्रोतो जैसे नौलों के पास रख दिया जाता है। कुमाऊँ क्षेत्र के सबसे प्राचीन मुकुट विक्रेता श्री सुरेश चन्द्र जोशी जी (पं. गोपाल दत्त जोशी, बुक सेलर, चौक बाजार, अल्मोड़ा) बताते है कि कुमाउँनी मुकुट की बिक्री अल्मोड़ा से ही शुरू हुई थी। 1990 के आस पास तक मुकुट अल्मोड़ा से ही पूरे कुमाऊं में भेजें जाते थे। उनके दादा पंडित गोपाल दत्त जोशी जी ने 1898 में मुकुट बना कर बेचने की शुरुआत की थी। जोशी जी बताते है कि 1970 में एक जोड़ा मुकुट लगभग 60 पैसे में आता था, जबकि महंगा मुकुट 5 रुपए का आता था। अब मुकुट की कीमत 100 से लेकर 400 रुपए तक हो गई है। गत्ते पर प्रिंटेड फोटो और लेस चिपका कर मुकुट बनाने का कार्य अब भी वह स्वयं ही कर रहे है।



    लेखक -श्री सुरेश चन्द्र जोशी, श्री पं० गोपाल दत्त जोशी, बुकसेलर, चौकबाजार, अल्मोड़ा
    चित्र -
    वैभव जोशी

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