Folklore

    आमा - बुबू

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    AmaBubu

    ‌दिल्ली में रहने वाले नन्हे दीपक को हमेशा गर्मियों की छुट्टियों की प्रतीक्षा रहती।अप्रैल में सालाना परीक्षाओं के बाद तो मानो उसका मन शहर में लगता ही न था। हर पल अपने बाबा से पूछता, “पापा, हम आमा-बडबाज्यू के पास कब जाएँगे?”


    ‌काम की व्यस्तता के कारण मोहन बाबू पहाड़ों में अपने माता-पिता के पास नहीं जा पाते थे। विवाह के बाद से ही वे परिवार को लेकर काम की तलाश में दिल्ली आ गए। शहर की भीड़-भाड़ और रोटी की चिंता में कब बाल सफ़ेद हो गए मोहन बाबू को पता ही न चला। उनकी पत्नी रेखा भी सिलाई का काम करती और परिवार के पालन-पोषण में हाथ बँटाती थी। किसी तरह जीवनयापन कर रहा था मोहन बाबू का छोटा सा परिवार!!


    ‌पहाड़ में बाबूजी और ईजा रहते थे। “मोहन, बेटा अब अकेले मन नहीं लगता। अपने साथ ले चल।” कहने पर मोहन बाबू हर बार यह कहकर टाल देते कि “बाबू,एक बार बड़ा घर ख़रीद लूँ फिर अगले ही दिन ले चलूँगा।”


    ‌ये सिलसिला न जाने कितने सालों से चला आ रहा था। मन ही मन बाबूजी जानते थे कि बेटे के साथ जाना न हो पाएगा फिर भी ख़ुद को दिलासा देने के लिए बेटे की बातों से अपना दिल बहलाते और मुस्कुरा देते।


    ‌बाबूजी की इसी मुस्कान का तो दीवाना था, दीपू! दीपक को इसी नाम से बुलाते थे उसके आमा-बड़बाज्यू। आमा का इकलौता पोता जिसमें दादा-दादी की जान बसती थी।


    ‌बूढ़ी आँखें राह देखती और पूरे साल बस गर्मियों की प्रतीक्षा करती। आमा, दीपू के लिए धूप में बड़ियाँ सुखाती, अचार बनाती और गाँव भर को ख़बर हो जाती कि आमा की आँखों का तारा,उनका दीपू आने वाला है।


    ‌इस साल भी हर साल की तरह मोहन बाबू पत्नी रेखा व बेटे के साथ पहाड़ पहुँचे। पहाड़ में हो रहे विकास की सराहना की। पिताजी से कहा, “बाबूजी, अब वह दिन दूर नहीं जब आप फुर्र से शहर में अपने बेटे के पास आ सकेंगे। गाँव में सड़क जो बन गई है!”


    ‌बाबूजी ने कहा, “मोहन, इन्हीं कच्ची सड़कों पर खेलकर तू बड़ा हुआ, तेरी माँ घड़ों में पानी लाई और मैंने भी तो इन्हीं सड़कों में काम किया है। गाँव में विकास हो रहा है अब तू भी अपना काम यहीं से कर सकता है।”


    ‌मोहन बाबू को बाबूजी का सुझाव रास न आया। वे गुस्साते हुए बोले, “कैसे बाप हैं आप? अपने बेटे को तरक़्क़ी के मार्ग पर देख ईर्ष्या हो रही है। मैं शहर में ही अच्छा हूँ।” कहकर मोहन बाबू रसोई में काम करती रेखा और आमा की गोद में खेल रहे दीपू को खींचकर कमरे में ले गए।


    ‌मोहन बाबू ने फ़ैसला किया कि वे गाँव लौटकर नहीं आएंगे। अगले दिन परिवार के साथ वहाँ से चले गए। दीपू को रोता देख आमा-बूबू की आँखें भर आईं। एक समृद्ध वृक्ष से अनुमति लिए बिना उसकी शाखा को काटकर अलग कर दिया गया। पेड़ बहुत रोया परंतु जिसे जाने था वह चला गया।


    ‌दिन बीते,महीने बीते, साल गुज़र गए। मोहन बाबू जो रूठे फिर गाँव लौटकर नहीं आए। बूढ़ी-पथराई आँखें थक गईं।


    ‌आमा-बूबू ज़िंदा लाश बन गए थे। मोहन बाबू ने शहर में एक घर ख़रीद लिया था। दीपू बड़ा हो गया था और धीरे-धीरे गाँव की यादें धूमिल हो चली थीं।


    ‌शहर की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में इंसान गाँव में बसे अपनों को भुला देता है।


    ‌आज दीपू एक सफल व मेहनती इंजीनियर बन गया है। पिताजी से अनुमति लेकर गाँव गया। “अब तो आमा-बूबू बूढ़े हो गए होंगे!” सोचते हुए आमा के लिए शॉल और बुबू के लिए एक हुक्का ख़रीदकर अगली गाड़ी से निकल पड़ा।


    ‌गाड़ी से उतरकर दीपक किसी को पहचान न पाया। गाँव बदल गया था। पक्की सड़कें, हैंडपंप, मोबाइल टावर, केबल-रेडियो न जाने क्या-क्या सुविधाएँ अब गाँव में उपलब्ध थीं। अपने गाँव को तरक़्क़ी के पथ पर देख दीपू की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। भागता हुआ वह अपने घर जा पहुँचा। जी हाँ, अपना घर!! शहर के घर को दीपू ने कभी अपना माना ही कहाँ? उसके लिए तो यही उसका घर था और रहेगा।


    ‌वहाँ पहुँच उसने जो देखा उसे वह आज भी भुला नहीं पाया है। घर अब एक खण्डहर था। आमा-बुबू को गुज़रे सालों बीत गए। मोहन बाबू ने यह सब दीपू से छिपाकर रखा ताकी उसकी पढ़ाई पर बुरा असर न पड़े।


    अब खुमानी के पेड़ पर गौरय्या नहीं आती
    और बूढ़ी आमा लाठी से कव्वे नहीं भगाती।
    न बाबा के हुक्के की गड़गड़ाहट
    न आँगन में सिटौलों की चहचहाट।


    ‌अब यादों के अलावा दीपू के पास कुछ न था। कभी सोचता है कि “काश! बाबा अपने साथ शहर ले आते तो शायद आज आमा-बुबू ज़िंदा होते।”


    ‌कभी ख़ुद को तो कभी अपने माँ-बाप को कोसता दीपू, गाँव में एक स्कूल, एक रेस्टोरेंट और एक कम्प्यूटर प्रशिक्षण केंद्र बनवा रहा है। जिससे गाँव के लोगों को काम ढूँढने शहर न जाना पड़े और किसी दीपू से अपनी दादी की गोद और बाबा का प्यार न छिन पाए।


    लेखिका - डॉ. प्रेरणा जोशी।
    डॉ. प्रेरणा जोशी पेशे से डेंटिस्ट है और साथ ही लेखन का शौक रखती है।

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