Folklore

    आदमी का डर

    Read This Article in Hindi/ English/ Kumauni/ Garwali

    सर्दियों की शुरूआत के साथ ही गाँव-टोले में कहीं 'ले जम्बू' की आवाज सुनाई देती तो आँगन में खेलते बच्चे दुबककर अपनी-अपनी माँओं के आंचल में छिप जाते।


    बच्चों के होश संभालने के साथ ही माँए उनके मन में एक आतंक भर देती थीं। एक सामान्य सा मुहावरा ‘हुणियाँ आया’ सुनते ही रोते बच्चे सहम कर चुप हो जाते और जिद्दी बच्चा अपनी माँगे भूल जाता था। ऐसे ही वातावरण में हम पले-बढ़े थे।


    भूत-पिशाच रहते हैं- ऐसा बड़े-बूढ़े बताया करते। कहीं भली-बुरी जगह में हग-मूत दिया, कोई अनकहनी बात कह दी तो विपदा गले पड़ जाती- वह पीछे लग जाते। फिर आदमी अक्-बक् बोलता, बुखार में तड़पता। पूछ कराने, भभूत लगाने और देवता नचाने से कीं कुछ निदान होता।


    डर जोगी-जोगिनों का भी हुआ। चिमटा खड़काता, अलख निरंजन की गुहार लगाता, लम्बी दाढ़ी-बालों वाला कोई जोगी आ गया या ‘माई भिच्छा दे’ पुकारती कोई जोगन आ गई तो बच्चों से अधिक डर उनके माता-पिता को हो जाता- कहीं कोई तंत्र-मंत्र करके वह बच्चों को परसाद न खिला दें, या कोई अनोखा भभूत लगा दे कि अनकी पाली-पोसी संतान घर-बार छोड़कर भगोड़ा न हो जाए और गाँजे-अत्तर की दम लगाने वाले जोगियों की पांत में शामिल हो जाए।


    डर भालू-बाघ और लंगूर-बंदरों का भी हुआ ही। भालू-बाघ जंगल से घास-पात, लकड़ी-ईंधन लाने वालों या काफल-बमौर जैसे मौसमी फलों को चुनने वाले ग्वाल-बालों को कभी-कभार दिख जाते लेकिन लंगूर-बानर तो घर की देहरी से ही चीजें उठा ले जाने वाले हुए। कब बच्चों को काट खाएं, नखोट दें, उनका कोई भरोसा नहीं हुआ।


    कुछ भी कहें, भूत-पिशाच, जोगी-जोगिन, लंगूर-बानर, भालू-बाघ का किस्सा रोज का ही हुआ। हमारे लिए यह सब खेल-तमाशे की तरह था, लेकिन हुणिये की डर को कोई जवाब नहीं।
    ये लोग कौन थे, कहां से आते थे, इसका हमें कोई ज्ञान नहीं था। बड़े-बूढ़ों ने अपनी परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए हमारी कल्पना में उनका जो रूप गढ़ दिया उसमें हम उनकी पीठ पर लदे भारी-भारी थैलों में अपहरण किए हुए बच्चों की घुटती सिसकियां ही सुन पाते थे। लम्बे ऊनी चोगे में लिपटा हुआ शरीर, पैरों में रोएँदार लम्बे जूते, कई-कई वेणियों में गूंथे सिर के बाल, छोटी-छोटी आँखों वाला चौड़ा चेहरा और सुदीर्घ पृथुल काया। दाढ़ी-मूँछ के मामले में पुरूष भी स्त्रियों से होड़ लेते और उनमें भेद करना कठिन होता था।


    वे गृहणियां जिन्हें अपनी पाककला पर नाज़ रहता था; वे बूढ़ी दादियां जो पालने के बच्चों से लेकर नवेली बहुओं की बीमारियों तक का अचूक इलाज जानती थीं, वर्ष भर उनकी उत्सुक प्रतीक्षा करती रहती थीं क्योंकि उन थैलियों में उनकी जरूरत की सभी दुर्लभ वस्तुएं उपलब्ध रहती थीं। हर चीजके लिए देर-देर तक मोल-भाव होता, चख-चख मचती और अन्त में वस्तुओं के साथ अनाज का आदान-प्रदान होता।


    हम सुनते थे कि वे लोग बड़े-बड़े दल बनाकर बकरों, झबरे, बैलों और खच्चरों की पीठ पर अपना माल लादकर, दुर्गम पहाड़ियों को लांघकर किसी अज्ञात लोक से महीनों की यात्रा पूरी कर वहां आते हैं। उनके खूंखार कुत्ते बाघ और गुलदार से टक्कर लेते हैं। उन दुर्गम पहाड़ियों के पार उनका देश कैसा था, उनके बच्चे कहाँ थे, वे अनोखी वस्तुएं उन्हें कहाँ से मिल जाती थीं, इन सब बातों का समाधान हमारी बाल कल्पना से बाहर की बात थी।


    किसी बड़े थैले के अन्दर से असंख्य छोटे-छोटे थैले निकालकर वे घर के आंगन में अपनी दुकान फैला देते-सूखी हरी घास के रूप में गृहणियों की प्रिय वनस्पति जम्बू, मह-मह महकती हींग, सुहाग, मूंगे, शिलाजीत, गंध्राणी, कस्तूरी के नाभे ही नहीं निर्जन वन में घास की कटाई करने वाली का लोहे का छोटा सा वाद्य ‘बिणई’ और न जाने कैसी-कैसी चमत्कारी चीजें उन थैलियों से निकालकर ग्राहकों के लिए नुमाइश का रूप ल लेतीं। एक हाथ से थैली टटोलता और दूसरे हाथ से सिर खुजलाता हुआ ‘हुणियाँ’ हमारे लिए कुतूहल और आतंक का पात्र बना रहता। सौदा-सुलफ कर चुकने के बाद कोई-कोई मुक्तभोगी बुढ़िया बच्चों को यह बताना न भूलती कि अन्य थैलों में हमीं जैसे बच्चे बन्द पड़े हैं।


    ऐसे वातावरण में किसी निर्जन स्थान में किसी हुणिये से मुठभेड़ की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन उस दिन न जाने किस मुहूर्त में मैं घर से स्कूल के लिए रवाना हुआ था कि मेरी जान सांसत में पड़ गयी।


    स्कूली संगी-साथी मुझे हॉक लगाकर और थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के बाद चल दिये थे। घर से प्राइमरी स्कूल तक का प्रायः मील भर का रास्ता देवदारू के घने जंगल के बीच से होकर मुझे अकेले ही पार करना था। सुबह से ही आसमान हिमानी बादलों से गहराया हुआ था। देवदारू का वन सामान्यतः वैसे भी छायदार वृक्षों के कारण अन्धकारपूर्ण रहता है और उस दिन तो बादलों के कारण और भी डरावना प्रतीत हो रहा था। अपने-अपने ढाढस बंधाने के लिए मैं जोर-जोर से सीटियाँ बजाता, दौड़ता-भागता किसी तरह अपना रास्ता तय कर रहा था कि तभी पा्रयः फर्लाङग भर दूर, रास्तं के मोड़ पर, मुझे उसकी आकृती दिखाई दी। पीठ पर भारी थैले लादे, कंधों को थोड़ा आगे की ओर झुकाए वह लम्बा-चौड़ा हुणियाँ मेरी ओर ही चला आ रहा था। उस सँकरे रास्ते पर उससे बचने का कोई उपाय नहीं था। मुझे न जाने कैसे यह विश्वास हो गया थ कि मैं अभी तक उसकी नजरों में नहीं पड़ा हूँ। बचने का और काई उपाय न देखकर मुझे एक तरकीब सूझी और मैं रास्ते के किनारे ही खड़े एक विशाल पेड़ की ओट में दम साधकर छिप गया। मेरी साँस तेजी से चलने लगी थी और उपने दिल की धड़कन मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही थी।


    संकट के उन क्षणों में मैंने मन-ही-मन न जाने कितनी मनौतियाँ मना डालीं। धीरे-धीरे हुणिये की पदचाप और लाठी की ठक्-ठक् मेरे निकटतर होती गयी। उस निर्जन वन में मेरे लिए उन पदचापों के अतिरिक्त और कोई आवाज शेष नहीं रह गयी थी। आवाजें निकट से निकटतर होती गयीं। मैं अपने बचाव के लिए उसी अनुपात में पेड़ की परिधि में खिसकने का उपक्रम करने लगा पर सहसा वे ध्वनियाँ रास्ते से हटकर मेरे सुरक्षा स्थल की ओर बढ़ने लगीं और अगले ही क्षण वह लम्बा-चौड़ा ‘हुणियाँ’ मेरे ऊपर झुका हुआ था। मेरा सम्पूर्ण शरीर भय से थर-थर काँपने लगा और मैं अगले क्षणों की कल्पना से ही सिहर उठा।


    ‘हुणियाँ’ ने अपनी दोनों भारी हथेलियों में लेकर मेरा मुँह ऊपर उठाया और इस लुका-छिपी के खेल में अपनी विजय प्रकट करने के उद्देश्य से मुस्कुराया। अपनी छोटी-छोटी नीली आँखें नचाते हुए वह अपना सिर हिला-हिलाकर सीटिंया बजाने लगा और फिर मेरे गालों को थपथपाकर अपने रास्ते पर चल पड़ा।



    लेखक -शेखर जोशी
    संदर्भ -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30

    Related Article

    Ama-Bubu

    Leave A Comment ?

    Popular Articles

    Kafal Pake Meine Nahi Chakhe

    Deodar (The Story of Uma)

    Golu Devta - Folk Story of Goljyu

    Chal Tumari Baantu Baat

    Buransh - Folk Story

    Patwari Gumaan Singh

    Cow, Calf and Tiger

    Bhitoli - Story of Nariya and Debuli

    948

    Ama-Bubu

    903

    Rama Dharni

    865

    Also Know

    Cow, Calf and Tiger

    Buransh - Folk Story

    Ha Didi Ha

    702

    Chal Tumari Baantu Baat

    Deodar (The Story of Uma)

    Ajuwa Bafaol

    499

    Kafal Pake Meine Nahi Chakhe

    Rama Dharni

    865

    Golu Devta - Folk Story of Goljyu

    Bhitoli - Story of Nariya and Debuli

    948