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    गढ़वाली लोक साहित्य में जीवन मूल्य -1

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    यह गढ़वाली लोक गीत स्वयं में अनूठा कलेवर धारण किये हुए है। इसमें एक साथ अनेक मूल्यों की प्रतिष्ठा हुई है। चोरी न करना नैतिक मूल्य है, तम्बाकू न पीना सामाजिक मूल्य, ईर्ष्यालु न होना नैतिक वैयक्तिक मूल्य, रिश्वत या घूस न लेना नैतिक सामाजिक मूल्य है। अंतिम पंक्तियाँ कर्मशीलता को मूल्य रूप में प्रतिध्वनित करती है। 'जबान का घाव' लोक कथा क्षमाशीलता की पक्षधर है तो 'माधोसिंह मलेथा' की लोक कथा त्याग, बलिदान, लोकहित, मानव कल्याण की। इसी लोक कथा में चीनी आक्रमण में शहीद होने वाले माधो सिंह के माध्यम से कर्मवीरता व स्वाभिमान आदि वैयक्तिक मूल्यों की भी संस्थापना हुई है।


    अन्य लोक कथाओं में भी प्रकारान्तर से कर्म एवं सघंर्ष, महत्वाकांक्षा, न्यायप्रियता, उदारता, करूणा, दया, अत्याचार के विरूद्ध विद्रोह के स्वर आदि का अभिव्यंजित किया गया है। लोक गाथाएँ भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। सुरज कुँवर और रानी बौराणी की लोक गाथा के माध्यम से उच्च नैतिक आचरण की प्रतिष्ठा की गई है। सुव्यवस्थित जीवन की संकल्पना जीवन मूल्यों के द्वारा ही संभव होती है। ’ए जा अगनी मेरा मातलोक ’ लोकगीत में पारिवारिक व सामाजिक जीवन की कड़ियों के विश्रृंखलन, मर्यादाओं के भंग होने, लोक में फैल रहे अत्याचार आदि स्थितियों के चित्रण क माध्यम की आवश्यकता व स्थापना की ही उद्देश्य व्यंजित हुआ है।


    औजियो द्वारा अपने संरक्षण कर्त्ताओं की प्रशस्ति में गाए जाने वाले गीतों में सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, तथा जगत के कल्याण व सुख-समृद्धि की लोकहितकारी कामना निहित है-


    धरती माता सोनों बरसौ
    नाज का कोठर-दे
    धन का भंडार दे


    राजा हरिशचन्द्र के जागर के माध्यम से ’दान’ जीवन-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है। जहाँ अन्न व भूमि आदि के दानों की महत्ता प्रतिपादित हुई है-


    दान्यों मा दानी होलो, बल राजा हरिशचन्द्र दानी
    अन्न दान, भूमि दान देन्दू राजा हरिशचन्द्र


    सेवा, त्याग और समर्पण का इससे बड़ा उद्धरण और क्या हो सकता है कि ससुराल से विदाई के समय भाई बहन से कहता है कि बिना क्रोध किये सास-ससुर की सेवा करना, किसी के बुरा-भला कहने पर अनसुना करना तथा ससुराल के लोगों को अपना भाई-बहन, माँ तथा पिताजी समझकर उसकी सेवा करना क्योंकि मानवीय गुणों का पाठ तो व्यक्ति परिवार से ही सीखता है-


    सास ससुर की सेवा करणी, गुस्सा कभी नहीं लाणैंद
    भलो बुरो जु कवी भी बोलो, सुणी नी सुणी कराणौंदा
    भाई-बैणो को प्यार करणु, बई बाबू की सेवादा।


    मानव जीवन में सुख व दुःख के क्षण चक्रवत् रूप में बारी-बारी से आते ही रहते है। सुख के क्षण तो मनुष्य को प्रिय लगते हैं परन्तु दुःख के क्षणों में वह हताश, निराश व अवसादग्रस्त हो जाता है। गढ़वाली लोक साहित्य में दुःख के प्रति समत्व भाव अथवा समत्व दृष्टि जीवन मूल्य के रूप में चित्रित है। दुःख से मुक्ति का एक ही उपाय है कि साहस के साथ उसका सामना तटस्थ भाव से किया जाय। इस समत्व दृष्टि को विकसित करने के लिए प्रकृति से उद्धरण लिये जाने हैं कि सभी फूल, फल नहीं बन पाते और लोक में सभी का यौवन सार्थक नहीं होता। सभी नदियों पर पुल नहीं लगाए जा सकते न सभी सुन्दरियों को घर लाया जा सकता है-


    जेती न होन्द नदी नाड़, तेती भी लायेन्दी तर
    जेती न होन्द मुलक बांठीण तेती न लायेंदी घर ।।


    गढ़वाल की सामाजिक व्यवस्था में एक ओर उच्च जातियाँ हैं तो दूसरी ओर निम्न आर्थिक स्तर वाले औजी, जो कि अपने संरक्षणकर्ता की कृपा दृष्टि पर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। विवाह गीत में वेदमुखी ब्रह्मण के ही समानान्तर औजी के बेटे को भी निमंत्रित किया जाता है कि परोक्षतः समाज में फैले जाति-भेद अथवा आर्थिक आधार पर मिलने वाली सामाजिक प्रतिष्ठा की खाई को समानता जैसे जीवन मूल्य के सेतु द्वारा पाटने का प्रयास है जिसमें कहा गया है-


    पैल्हे न्यूते पैल्हे वेद मुखी बरमा, तब न्यूते औजी का बेटा


    पहाड़ के श्रम साध्य और कठिन जीवन को जीने वाले गढ़वाली लोकजन कर्मशील, संघर्षशील हैं। कष्ट साध्य भौगोलिक परिस्थितियों का साहस से सामना करते हुए वे जीवन के प्रति उत्साह, आस्था, आशा और जिजीविषा से भरे हुए जीवन को उत्सव के समान जीते हैं। यही मूल्य वहाँ लोक साहित्य में भी प्रतिबिम्बित हुए है। ’नई डाली पैय्यां जामी, देवतों की डाली’ लोक गीत में पद्म के नन्हे से नये वृक्ष के उगने पर कहा गया है कि - उस नये पौधे के िएल चत्वारिका चिनो, उसको दूध से सीचों, दिया-बाती, धूप करो। इस उत्सव भाव के पीछे जीवन के प्रति आशा, आस्था, उत्साह व जिजीविषा ही प्रतिष्ठित हुई है।


    मृत्यु सम्बन्धी अनेक गीतों में भी जिजीविषा भाव व्यक्त हुआ है। अनपेक्षित, विषम स्थितियों में भी जीवन के प्रति आशा व आस्था समाप्त नहीं होती। कफू पक्षी के बोलने पर बहुत समय से मायके न आ पाने वाली - स्त्री को अब भी आशा है कि उसकी माँ उपहार भेजेगी या भाई उसे लिवाने आएगा-


    कफू बासलो मेरा मैत्यों का चौक
    मेरी ब्वई सुणली
    मैं कू कलेऊ भेजली
    मेरी ब्वई सुणली भैजी मेरा भेजली


    गढ़वाली लोक साहित्य में मृत्यु का सहज स्वीकार्य भी हैं। मृत्यु के दारूण दुःख को उसी सहज भाव से आत्मसात करने की दर्शनिक चेतना भी है जिस प्रकार सागर का पानी अंततः सागर में समा जाता है। मौत तो सभी को आती है, आग सभी को जलाती है अतः किसी की मृत्यु पर कायर नहीं बन जाना चाहिए-


    मौत सबूक औन्दे, आग सबूकू जगौंदे
    तिन कायरो नी हुण, सागर को पानी सागर समाँद।


    फ्यूँली लोक कथा में भी मृत्यु का सहज स्वीकार्य है। कि ’’मनुष्य मरते ही रहते हैं पर धरती का सुहाग सदा से अमर है। कहीं वृक्ष सूखते हैं, कहीं अंकुर फूटते हैं। (उत्तराखण्ड की लोक कथाएँ गोविन्द चातक - पृष्ठ दृ 86)


    गढ़वाली के छूड़े लोक गीतों में मृत्यु अथवा काल जैसे शाश्वत मूल्य का चित्रण हुआ है लेकिन इसका उद्देश्य मानव को भयाक्रान्त, निराश, कायर बनाना नहीं बल्कि प्रकारान्तर स उसे जीवन-मूल्यों की स्थापना के लिए अन्त प्रेरणा देना है। किसी की मृत्यु हो जाने पर रोने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता। अतः रोना व्यर्थ है-


    प्यारी को बोल्या, जादनी रोई, आँखो कू पाणी बिरथा खोई
    होइग्यूँ माटी अब बेकार रोण


    डां. गोविन्द चातक की पुस्तक ’’ गढ़वाली लोक गीत विविध ’’ में संकलित तरूणा डूबे, शीर्षक लोकगीत जीवन मूल्यों की उच्चाशयी भावभूमी पर आधारित है जिसमें एक लड़की नदी में पुल न होने के कारण डूब कर मर जाती है परन्तु मुत्युपरान्त भी उसकी विनती यही है कि कोई भाग्यशाली उस नदी पर पुल लगा दे ताकि उस पर फिर कोई मौत न हो-


    ’क्वी भाग्ययान लगायान गाड पुल, तरूणा को विनती करा कबूल’


    इस संकलन के 'नणदा सुशीला' गीत में जीवन के प्रति आस्था व जिजीविषा के स्वर मुखर हुए हैं क्योंकि सुख-दुःख तो लगे ही रहते हैं लेकिन जीवित तो रहना ही पड़ता है-


    ’’दुःख सुख लग्यां छन भाभी ज्यूँ रख्यूँ चैंद ’’


    गढ़वाल की प्रमुख लोक गाथाओं जैसे- राजा मानशाह, मालूसाही, सुरजू कुँवर, कफू चौहान, गंगू रमोला, कालू भण्डारी, धाम देवी, जीतू बगड़वाल तीलू रौतेली, चन्द्रवली, नौरंगी राजूला आदि में भी अने जीवन मूल्यों की स्थापाना हुई हैं। जिसमें प्रकृति ,प्रेम ,अद्भुत पराक्रम श्रृद्धा, विश्वास, त्याग , कर्मशीलता, विषम स्थितियों का साहसपूर्वक सामना तथा जिजीविषा के साथ ही सत्यं, शिवं सुन्दरम् की भी सफल व्यंजना हुई है।


    अंततः कहा जा सकता है कि जीवन मूल्यों की स्थापना की दृष्टि से गढ़वाली लोक साहित्य समृद्धिशाली है। प्रकृति के प्रति यहाँ जो अनन्य, आत्मीय व देवत्व भाव चित्रित हुआ है वह स्वयं में अद्भूत है। यहाँ प्रकृति पहाड़ जैसे कठोर जीवन व्यतीत करने वाले लोक जनों को न केवल कर्मशील व संघर्षरत रहने की प्रेरणा देती है बल्कि जीवन की सुख-दुखात्मक परिस्थितियों को समत्व दृष्टि से देखने की सामर्थ्य से भी युक्त करती है। विसंगत, अनेपक्षित स्थितियों में न केवल उसकी जिजीविषा को बनाए रखती है बल्कि उसके सुख-दुःख की सहभागी भी है।


    अन्य शाश्वत जीवन मल्यों में गढ़वाली लोक साहित्य प्रेम, सत्य, मानव, मानवत्व, नैतिकता, आध्यत्म, काल आदि को संस्थापित करता है। कल्याणवादी या परिवर्तनशील मूल्यों में सामाजिक, वैयक्तिक आदि अने जीवन मूल्य मुखर हुए है।


    संक्षेप में कहा जा सकता है कि गढ़वाली लोक साहित्य का केन्द्र मानव व मानवता का कल्याण ही है। मनुष्य के इस लोक साहित्य का स्रष्टा होने के कारण उसके जीवन का श्रेय-प्रेय है। यहाँ जिन मूल्यों कि प्रतिष्ठा हुई है वे आनन्द व कल्याणवादी मूल्यों है जिसके अन्तर्गत प्राचीन भारतीय मूल्यों के त्रिवर्ग का भी अन्तर्भाव हो जाता है।


    भाग 1 - गढ़वाली लोक साहित्य में जीवन मूल्य



    लेखक - श्री एल. पी. ढौंडियाल, नैनिताल
    सर्वाधिकार -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30

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