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    जिम कार्बट- एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट

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    विश्व प्रसिद्ध शिकारीशिकार कथाओं का महानायक, प्रकृति प्रेमी, बेजोड़ लेखक, छायाकार, गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्डस में अंकित नाम। तत्कालीन कूर्मान्चली जन-जीवन में रचा बसा एक नाम।


    प्रारंभिक जीवन


    बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तराखण्ड के भीतर दर्जनों नरभक्षी बाघ-बाघिनों को मारकर स्थानीय जनमन में बस गए जिम कार्बट का जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ। उनकी माँ का नाम मेरी नेन कार्बट था। उनके पिता क्रिस्टोफर कार्बट नैनीताल में पोस्टमास्टर थे। जिम कॉर्बेट का पूरा नाम एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट है। बड़े भाई टाम ने बचपन में ही जिम कार्बोट को बंदूक चलाना सिखा दिया था। कॉर्बेट ने सिर्फ हाईस्कूल तक की शिक्षा पाई। इसके बाद वह मोकामघाट रेलवे में ईंधन निरीक्षक हो गए। एक वर्ष तक इस पद पर रहने के बाद उन्हें प्रोन्नत कर सहायक स्टेशन मास्टर बना दिया गया।


    नैनीताल नगर पालिका के रहे सदस्य


    1920 में जिम कॉर्बेट ने रेलवे की सेवा से इस्तीफा दे दिया। नैनीताल लौटकर उसी वर्ष वहां की नगर पालिका के सदस्य चुने गए। वर्ष 1923 में उन्हें नैनीताल पालिका बोर्ड का उपाध्यक्ष बना दिया गया। 1944 तक वह पालिका से जुड़े रहे।


    ऐशे बने विख्यात शिकारी


    हालांकि जिम कॉर्बेट महान प्रकृति प्रेमी, वन्य जीव प्रेमी, महान छायाकार और उच्च कोटि के लेखक भी थे, मगर उत्तराखण्ड की आम जनता के मन में वह आदमखोर बाघ-बाघिनों के निभोक शिकारी होने के नाते बसे। जिस दौर में जिम कॉर्बेट रेलवे में कार्यरत, उन दिनों उत्तराखण्ड का तराई भाबर क्षेत्र भीषण जंगलों से भरा था। इन जंगलों में अनगिनत वन्य जीव थे। बाघों की भी बहुतायत थी। इन्हीं में से कुछ आदमखोर हो गए थे। मोकमघाट में रहते कॉर्बेट ने दो नरभक्षी बाघों को मार गिराया था। इसी दौरान वह अवकाश पर नैनीताल आए तो कुमाऊँ की पहाड़ियों में भी उन्होंने मौत के पर्याय बने दो नरभक्षी बाघों को मौत के घाट उतारा। इन घटनाओं ने जिम कॉर्बेट को आदमखोर बाघों के सफल शिकारी के रूप में विख्यात कर दिया। फिर तो उत्तराखण्ड में जहाँ-जहाँ आदमखोर बाघ सक्रिय होते उन्हें मारने के लिए कॉर्बेट को बुलाया जाने लगा। कॉर्बेट भी पीड़ित मानवता की सहायता के लिए आदमखोर बाघ को मारने फौरन चल पड़त थे।


    उत्तराखण्ड में उन्होंने चम्पावत, तल्लादेश, टाक, चूका, पनार, मुक्तेश्वर, मोहान, चौगढ़, पवल गढ़, कांडा, पीपलपानी, रुद्रप्रयाग आदि तमाम स्थानों पर नरभक्षी बाघ-बाघिनों का शिकार किया। इनमें से चम्पावत की नरभक्षी बाघिन को मारने की कथा कहीं अधिक सनसनीखेज है। इस बाघिन ने बीसवीं शताब्दी के शुरूआती चार वर्षों के भीतर चम्पावत और उसकी सीमा से लगे नेपाली क्षेत्र में सवा चार सौ से ज्यादा इंसानों को मारकर खौफनाफ मंजर पैदा कर दिया था। जिम कॉर्बेट ने अपनी जान जोखिम में डालकर इस क्षेत्र के वाशिन्दों को भयमुक्त किया। अपने जीवन के आखिरी दौर में कॉर्बेट ने वन्य जीवों पर बंदूक चलाना छोड़ दिया और सिर्फ कैमरे में उन्हें कैद करने का खेल चलाया।


    शिकारी अनुभवों पे लिखि किताबे


    शिकार कथाओं के नायक के साथ लेखक के रूप में भी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की। उनकी पहली पुस्तक 'मैन ईट आफ कुमाऊँ' 1944 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक की पहली कथा में चम्पावत की नरभक्षी बाघिन का ब्यौरा है। बाद के वर्षों में उनकी मैन ईटिंग लेपर्ड आफ रुद्रप्रयाग', 'द टेम्पल टाइगर, 'माई इंडिया' जंगल लोर' आदि किताबें छपीं। 'ट्री टाप्स' नाम की पुस्तक उनकी मौत के बाद प्रकाशित हुई। ये किताबें आज भी पर्यावरण व प्रकृति प्रेमियों से लेकर मौजूदा दौर के शिकारियों के लिए आदर्श बनी हुई है।


    मृत्यु


    1947 में कॉर्बेट नैनीताल व कालाढूंगी में अपनी परिसंपत्तियों को छोड़कर केनिया चले गए। वह 1955 की 19 अप्रैल को उनका देहावसान हो गया।


    भले ही कॉर्बेट अब दुनिया में नहीं हैं, मगर जीवित रहते उन्होंने उत्तराखण्ड के वाशिन्दों को नरभक्षी बाघ बाघिनों से मुक्ति दिलाने से लेकर अपने साहित्य के जरिये वन्य जीवन से जुड़े जिन रहस्यों व तथ्यों को उजागर किया, उन सबका महान एहसान मानते हुए यहां के लोग हमेशा उनके कृतज्ञ रहेंगे (कुमाऊँ महोत्सव-98 चम्पावत स्मारिका में श्री उमेश चन्द्र जोशी का लेख)

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