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    भैल्‍लो त्योहार

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    उत्तराखण्ड के पूर्वी अंचल में, एक बड़े पर्वतीय भूभाग में असोज मास की कन्या संक्रान्ति के शुभअवसर पर, अनेक गांवों में बड़े उल्लास से भैल्‍लो त्योहार मनाया जाता है। इस त्योहार में रात्रि के समय मशालों या तिल छिल्लों के झर-झर जलते शोलों के प्रकाश में एक विशेष रूप से बनाये पुतले को, केन्द्रीय स्थान में खड़ा कर अन्तत: उसे चिता अग्नि दी जाती है और प्राय: अनेक अपशब्दों के साथ अन्त में परंपरा से चले आ रहे गाथा बोल को समवेत स्वरों में उच्चारित किया जाता है। इन बोलों को हमने द्वाराहाट में जिस रूप में सुना था, उसे न लिखकर विद्वान लेखक कृष्णानन्द जोशी के लेख 'कुमाऊँ का लोक साहित्य' से बोलों को उद्धृत कर रहे हैं।


    'नैल्लो जी मैल्लो, भेल्लो खतडुवा,
    गै की जीत, खतडुवे की हार,
    खतुड़ लागो धारै धार
    गै मेरी स्योल, खतड़ पड़ो भ्योल।" (पुस्तक - कुमाऊँ संस्कृति पू. 22)

    किन्तु गै की जीत की जगह बद्रीदत्त पांडे जी ने 'कुमाऊँ का इतिहास' में 'गैड़ा की जीत' लिखा है, यद्यपि यह भी उल्लेख किया है कि कोई 'गै की जीत' भी कहते थे।


    भैल्‍लो त्योहार पचास साल पहले तक और भिलंग-उत्तरकाशी अंचलों में तो आज भी कहीं कहीं मनाया जाता है। सलाण याने दक्षिणी गढ़वाल अंचल में यह गाय-गोठ त्योहार स्वरूप में होता था और किसी तेज दौड़ने वाले गरीब पुष्ट व्यक्ति को श्रृंगारिक बाघ बनने को प्रभूत अन्न पैसा प्रलोभन देकर तैयार किया जाता था। इसके बाद लम्बे चौड़े सिलसिले वार खेतों याने सार-सारी या सैण क्षेत्र में कुछ दूरी पर उसे घुटने टिकाये बाघ मुद्रा में बिठाते थे। इधर लगभग 50-60 फुट की दूरी से तिल छिल्लों व चीड़ की छयूंनी को भीमल के छिल्लों पर बांध किसी भी क्षण आग लगाकर जलती मशालों को लेकर उस नकली बाघ की तरफ दौड़ पड़ने व उसकी मूंछें झुलसाने हेतु 15-20 किशोर युवा एक पंक्ति में खड़े होकर एक गायक की पंक्ति को दुहारते बाघ की दाढ़ को बन्द रखने के अभिप्राय से कुछ इस प्रकार के बोल दुहराते थे।


    "हमारे गाँव के जंगल की अमुक धार के, अमुक वन क्षेत्र के, अमुक छापर,तप्पड़ के रहने वाले बाघ की दाढ़ों को हम बांध रहे हैं।" उधर उस बाघ बने व्यक्ति को अनिवार्य रूप से तिल चावल मिश्रित अन्न को मुट्ठी भर के मुंह में रख चबाना होता था और जैसे ही एक धार या वन का बोल खत्म होकर भैल्लो की गूंज होती तो, वह चबाया अन्न उसे भूमि में थूकना होता था।


    अन्त में उसकी शामत आ जाती थी। जैसे ही 3-4 वन क्षेत्रों के नाम के साथ भैल्लो बोल समाप्त होते, सामने जल रहे अलाव से मशालें जलाकर युवा व किशोर उसे झुलसाने दौड़ पड़ते थे। उधर वह भी झुलसने से बचने को जंगल की तरफ दौड़ लगाता और प्राय: बच भागने में सफल हो जाता था। भैल्लो त्योहार का समापन अन्त में पत्तलों में खाई जाने वाली खीर के सुस्वादु भोजन से होता था।


    अत: कभी गाय-गोठ वाली यही बात कमाऊं में भी रही हो और आज के वातावरण में धीमान लेखक गै को गाय की जीत मानने का आग्रह इसी कारण करते हों, तो आश्चर्य नहीं होता।


    परन्तु हमारी इतिहास दृष्टि गैड़ा को सांस्कृतिक से अधिक ऐतिहासिक मान रही है।


    गैड़ा


    कुमाऊं के चन्द राजवंश में गैड़ा के सम्बन्ध में हमें सबसे पुराना उल्लेख गैड़ा जाति के सम्बन्ध में भारतीचन्द और रुद्रचन्द के समय का मिलता है। बाईस भाई गैड़ा और रैलिवास गाथा में भारतीचन्द राजा 1444-1499 ई. के समय कालू गैड़ा और उसके 22 पुत्र गैराड़ के सामन्त-कमीण थे। पुन: रुद्रचन्द की सेना में गैड़ा थे। यहां पर विस्तार से बताया है कि रुद्रचन्द (1565-1597 ई.) श्रीनगर गढ़वाल नरेश मानशाह (1591-1611 ई.) का समकालीन था। उसने तराई भाबर को मुगल सरदार हुसैनखां टुकड़िया के अत्याचारों से बचाया था और पुरुषू पन्त की सहायता से सीराकोट सहित राज्य की विजय की थी। अब अति उत्साहित होकर जब वह गढ़वाल के पिण्डर घाटी क्षेत्र बधाण को विजित करने बढ़ा तो मानशाह के संरक्षक बलरामशाह से संघर्ष हो गया। इस संघर्ष में पडियार सामन्त की गढ़वाल को सहायता से पुरुष्पन्त नाम का उसका सेनापति मारा गया और सहायता के लिए पडियारों को गढ़वाल राजा ने अपने राज्य में उपकृत किया था। इस पड्यार बिष्ट के वंशज श्यामसिंह-मोहन सिंह सन् चालीसपचास-साठ के दशक में उतने ही ख्यात नाम और सम्पन्न बधाण क्षेत्र में माने जाते थे जितने देवसिंह-दानसिंह बिष्ट अल्मोड़ा-नैनीताल जिलों में तत्कालीन समय में माने जाते थे।


    उधर कत्यूर घाटी की पुनर्विजय और डोटी तथा भाबर क्षेत्रों पर अपनी धाक जमाने के बाद रुद्रचन्द ने अपनी सेना के जिन वीर सैनिकों को पुरस्कृत किया था, उनके जाति नाम इस प्रकार मिलते हैं- "खोलिया, डसीला, सोन, गैड़ा, बोरा, अस्वाल, भैंसड़ा, बड़म्वाल, सन कणिया और फरकलिया।" अत: गैड़ा लोग 1600 ई. से पहले से कुमाऊँ के साथ हो गये थे।


    लगभग सभी जगह सन्दर्भ मिला है। कि गैड़ा गढ़वाल से सम्बन्ध रखते थे। कुछ पुस्तकों में यह उल्लेख है कि बाज बहादुर चन्द (1638-78 ई.) के समय उन्हें अधिक महत्व मिला था, जिसका प्रमाण सीरा ताम्रपत्र में साक्षी रूप में पूरणमल गैड़ा नाम मिलता है।


    रुद्रचन्द के बाद लक्ष्मीचन्द राजा हुआ। उसने सात युद्धों में लगातार पराजय के बाद आठवें युद्ध में जो दक्षिणी गढ़वाल सीमान्त में लड़ा गया था, गढ़नरेश मानशाह पर विजय पाई थी। यह धारणा सर्वत्र है कि इसी विजय के उपलक्ष्य में उसके राज्य में सर्वत्र भैल्ला त्योहार में गैड़ा की जीत और खतडुवा की हार का निनाद करने की परम्परा चली थी। हम इस अन्तिम युद्ध पर आगे चलकर विचार करेंगे और खतडुवा नाम पर ऐतिहासिक दृष्टि देंगे। यहां पर हम गैड़ा जाति के सम्बन्ध में कुछ और पंक्तियां देने जा रहे हैं।


    लक्ष्मीचन्द राजा के समय की 1605 ई. की गड्यार वाली बही में, जिसका सम्पादन प्रयाग जोशी ने ‘सीरा का देश को दवथर कुमाऊं राज' पुस्तक में किया है, उसमें चौगर्खा क्षेत्र में अस्वाल कुड़ी, दउड़ी कुड़ी के साथ गैड़ा कुड़ी का भी उल्लेख है। इसी बही में भूमि को व्योरो प्रकरण में 'थली गैड़ा की भूमि, डुला गैड़ा बड़ेत बड़गाऊँ, सकराम गैड़ा, गड़कोट, बीरम गैड़ा, खली, सिताल, साईं, नकुल, अचानु, सिउराज, कोसाल, बाउराज, वसन्त, सुकानु, सीतल गैड़ा जैसे नाम तत्कालीन नाम पद्धति की भी जानकारी देते हैं। चूंकि अब सभी गैड़ा बिष्ट रूप में अधिक परिचित हैं, अत: उनके तत्कालीन ग्राम नामों की भी यहां जानकारी दी जा रही है।


    यह गैड़ा ग्राम नाम बगड़ी, सलाखेत, गड़कोट, सेरा, गैड़ा राठ, लमा पटा, हुन्ती, गडेरा, बड़ेत, खीराधारा, फलेरा गाऊँ, गैड़ा खोली, कुताई बेर खेड़ा, बणेलया, बड़ाखेत, सुरौली, अटलगाऊँ, मेरथी, हाट तल्यूरा, जमसेर, कांडा, सिठोली, गुडयोली, महालेत, खोला, डुंगरीतलो आदि हैं। यहां पर हमें केवल यह संकेत देना है कि चन्दो ने जैसे बाद में गढ़वाल से बुलाये गये या पक्ष में लाये गये बंगारी रावत और सांवलिया बिष्टों को ग्राम दिये थे, वैसे ही पूर्व काल में गैड़ों को दिये गये थे।


    गैड़ा जाति गढ़वाल से कुजू अंचल में गई थी या पुरस्कृत कर बसाई गई थी, तो इसके कुछ संकेत साक्ष्य गढ़वाल में भी अवश्य होने चाहिये। इस दृष्टि से विचार करने पर सबसे पहले हमारा ध्यान गैरसैण/गैड़ी सैण
    के गैड़ी गांव और गैड़ी जाति पर जाता है। वर्तमान गैड़ी जाति अपने जाति सूत्र को गौड़ जाति से जोड़ते हैं। वे ब्राह्मण हैं तथा उस क्षेत्र के अनेक गांव के पुरोहित भी हैं। तब हमारा यह मत बनता है कि मैदान से आने वाली और बसाई जाने वाली जाति वर्ण द्विज को गैड़ा लोगों के कुमाऊँ पक्ष में चले जाने से उनकी भूमि में बसाया गया था। तब गैड़ा जाति ग्राम के आधार पर उनकी संज्ञा भी गैड़ी (ब्राह्मण) हो गई थी। हमारी इस संभावना को इस बात से भी बल मिलता है कि अनेक थोकदारों ने किसी कारण वश अन्यत्र चले जाने पर वहां किसी ब्राह्मण जाति को बसा दिया था। यथा पोखरी के वुगाणों से पहले वह गाँव कफोला बिष्टों का था।


    यहीं पर एक और बात पर भी ध्यान जाता है कि गैड़ी गांव के ऊपर जंगल में नन्दा का अति प्राचीन ठौंक और मंदिर है, जहां आज भी जात जाती है और मेला लगता है। तब हम कत्यूरी राजवंश की इष्ट देवी नन्दा और बधाण की नन्दा नाम प्रसिद्धि आधार पर गैड़ा जाति, सरदार याने प्राचीन सामन्त की विद्यमानता कत्यूरी काल तक ले जाना चाहेंगे। ज्ञातव्य है कि जब कत्यूरी राज्य अनेक आलों में बंटकर प्रभावहीन हुआ तो गढ़वाल क्षेत्र के राठ में कन्यूर (वर्तमान थैलीसैण) में ही कत्यूरी राजशाखा सिमटी थी। अजेयपाल पर 1500 ई. के आसपास चन्द राजा किराती चन्द (1499-1506ई.) और नागनाथ जोगी के मंत्र बल उत्साह से चांदपुर गढ़ पर आक्रमण करने वाली चन्द सेना को हराने इसी कन्यूर से ही लमछड़ी बन्दूकें भेजी गई थीं।


    एक और संकेत यह भी मिलता है कि बागेश्वर जिले में अनेक पहाड़ी ढाल वाले गांवों में गड़िया जाति के लोग मिलते हैं। जो बताते हैं कि वे गढ़वाल से आने के कारण कुमाऊं बोली में गड़िया सम्बोधन से कहे जाते हैं।


    जो भी उस धुंधले इतिहास में घटित हुआ हो, स्पष्ट साक्ष्य के अभाव में अनुमान लगाने को विवश करते हैं । यहां हम लक्ष्मीचन्द (लक्ष्मणचन्द) की आठवीं विजय के विजयी सेनापति गैड़ा सरदार का नाम बताने में असमर्थ हैं। अवश्य ही बाद में उसके वंशजों की अल्मोड़ा दरबार में जोरदार और विध्वंसकारी उपस्थिति लगातार मिलती रहती है। इनमें माणिक और पूरणचन्द गैड़ा की गैड़ागर्दी और दीपचन्द राजा (1748-77 ई.) के समय के बख्शी पद पर रहने वाले परमानन्द बिष्ट (गैड़ा) की कारस्तानी इतिहास में दर्ज है। पाठक एक और संभावना पर भी सोच सकते हैं। हो सकता है कुमूं के कैड़ा और गढ़वाल के गैड़ा का कभी एक ही समुदाय रहा हो। यहां भाषा विज्ञान सहायता कर रहा है।

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